शौहर से बदला लेने के लिए भाई जान से चुदी -1
By साहिबा Published on पढ़े जाने की संख्या: 1438
ये कहानी साहिबा जुल्फिकार नाम की एक शादी शुदा लड़की की है. जो पेशे से एक लेडी डॉक्टर है. और आज तक अपनी जिंदगी के 28 साल गुज़ार चुकी है. साहिबा पैदा तो बनारस सिटी के पास एक गाँव में हुई मगर पाली बढ़ी वो बनारस सिटी में थी.
साहिबा के उस के अलावा एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई हैं. साहिबा की बहन मुमताज उस से एक साल बड़ी है.जब कि उस का भाई आज़म अहमद साहिबा से एक साल छोटा है. साहिबा ने मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद बनारस के सरकारी हॉस्पिटल में हाउस जॉब स्टार्ट कर दी.
पढ़ाई के दौरान ही साहिबा के वालदान ने दोनो बहनों की शादी के लिए रिश्ता पक्का कर दिया था और फिर एमबीबीएस करने के तकरीबन एक साल बाद साहिबा और उस की बहन की एक ही दिन शादी हो गई. साहिबा की बहन मुमताज तो शादी के फॉरन बाद अपने हज़्बेंड के साथ मारीशस चली गई. जब के साहिबा ब्याह कर रामपुर के करीब एक गाँव में चली आई.
साहिबा के हज़्बेंड जुल्फिकार अपने इलाक़े के एक बहुत बड़े ज़मींदार थे. साहिबा ने मेडिकल कॉलेज के हॉस्टिल में रहने के दौरान अपनी कुछ क्लास फेलो लड़कियों के मुक़ाबले शादी से पहले अपने आप को सेक्स से दूर रखा था. इसलिए साहिबा अपनी शादी की रात तक बिल्कुल कंवारी थी.
शादी के बाद साहिबा सुहाग रात को अपने रूम में सजी सँवरी बैठी थी. जुल्फिकार कमरे में आए और साहिबा के पास आ कर बेड पर बैठ गये. साहिबा जो कि अपना घूँघट निकाल कर मसेहरी पर बैठी हुई थी. वो अपने शोहर जुल्फिकार को अपने साथ बेड पर बैठा हुआ महसूस कर के शरम के मारे अपने आप में और भी सिकुड सी गई.
जुल्फिकार ने जब साहिबा को यूँ शरमाते देखा तो कहने लगा कि साहिबा मेरी जान आज मुझ से शरमाओ मत अब में कोई गैर थोड़े ही हूँ तुम्हारे लिए अब तो हम दोनो मियाँ बीवी हैं. फिर थोड़ी देर जुल्फिकार ने साहिबा से इधर उधर की बाते कीं. जिस की वजह से साहिबा की जुल्फिकार से झिझक थोड़ी कम होने लगी.
थोड़ी देर बातें करने के बाद जुल्फिकार ने जब देखा कि अब साहिबा थोड़ी कम शरमा रही है तो उस ने आगे बढ़ कर साहिबा के गुदाज बदन को अपनी बाहों में भर लिया. जिस की वजह से साहिबा तो शरम से और सिमट कर रह गई.
एक मर्द का हाथ अपने जिश्म से पहली बार टच होता महसूस करके रुबीना के जिश्म में एक मस्ती सी छाने लगी। मकसूद ने रुबीना को ऊपर किया और पहले रुबीना के बालों के जूड़े को खोला और फिर रुबीना की ज्वेलरी उतारनी शुरू कर दी। ज्वेलरी उतारने के बाद मकसूद ने रुबीना के होंठों को किस किया।
ज्यों ही मकसूद के होंठ रुबीना के होंठों से मिले तो रुबीना के जिश्म में गर्मी की एक ऐसी लहर उठी, जो एक पल में सीधे उसके कोमल मम्मों के निपलों को खड़ा करती हुई उसकी सील-बंद चूत तक पहुँच गई, और उसकी चूत को पानी-पानी कर गई।
रुबीना भी आखीरकार, एक जवानी से भरपूर लड़की थी। जिसने अपनी शादीशुदा सहेलियों से सुहागरात के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। उसके दिल में भी शादी की पहली रात के कुछ अरमान थे। इसलिये वो भी अपनी शर्मो हया को भुलाकर कुछ ही देर बाद मकसूद का साथ देने लगी।
मकसूद के होंठों और उसकी गरमजोश हरकतों ने रुबीना को मदहोश कर दिया, और इस मदहोशी के आलम में उसे पता ही नहीं चला की कब और कैसे मकसूद ने उसे और अपने आपको कपड़ों की कैद से आजाद कर दिया था। रुबीना ने जब पहली बार अपने शौहर को इस तरह अपने सामने पूरा नंगा देखा तो उसने शर्म के मारे अपनी नजरें झुका ली।
पलंग पर रुबीना मकसूद के सामने पूरी नंगी बैठी हुई थी। रुबीना के खूबसूरत कोरे बदन को देखकर मकसूद की आँखों में चमक आ गई। मकसूद ने एक पल अपनी बीवी के जिश्म का गौर से भरपूर जायजा लिया, और फिर रुबीना के जवान ब्राउन निपल को मुँह में भरकर चूसने लगा।
अपने निपलों पर मकसूद का मुँह करते ही रुबीना सिसक गई। और फिर कमरे में वो खेल शुरू हुवा जो हर नये मियां-बीवी अपनी शादी की पहली रात को एक दूसरे के साथ करते हैं। मकसूद ने रुबीना के गालों, होंठों और मम्मों को चूस-चूसकर और अपनी उंगलियों के साथ उसकी कुँवारी चूत से खेलकर रुबीना को मजे से बेहाल कर दिया।
काफी देर अपनी बीवी के जिश्म को प्यार करने के बाद मकसूद ने रुबीना की टांगों को फैलाया और फिर अपना लण्ड रुबीना की कुँवारी फुद्दी पर रखा और धीरे-धीरे अंदर डालने की कोशिश करने लगा। रुबीना की कुँवारी चूत अपने शौहर का बड़ा लण्ड ले ही नहीं पा रही थी, और वो चिल्ला उठी- “हाईई नहीं मकसूद आह्ह… प्लीज़्ज़… निकाल दो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है…” और अपने शौहर को रुकने का कह रही थी।
मगर मकसूद उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था। मकसूद ने एक झटका दिया और पूरा लण्ड अपनी बीवी की चूत में डाल दिया। दर्द की शिद्दत से रुबीना के तो आँसू ही निकल गये। पर वो चीख भी नहीं सकी। क्योंकी मकसूद ने रुबीना के मुँह में मुँह डालकर उसके मुँह को बंद कर दिया था।
जब दर्द की शिद्दत थोड़ा कम हुई तो मकसूद ने अपना मुँह रुबीना के मुँह से हटाते हुये कहा- “ऐसा करना पड़ता है, वर्ना तुम दर्द नहीं सह पाती। अब आगे दर्द नहीं होगा। क्योंकी अब तुम्हारी सील फट गई है, और उसमें से खून भी निकल रहा है…” फिर मकसूद ने अपने झटकों की स्पीड बढ़ा दी।
अब रुबीना को भी दर्द कम होने के साथ-साथ मजा आने लगा और वो सिसकते हुये कहती रही- “जानू धीरे डालो मजा आने लगा है…”
जुल्फिकार अपनी बीवी की बात सुन के जोश में आ गया और तेज़ तेज़ झटके देने लगा और साथ ही साहिबा के मम्मो और निपल्स को भी काट रहा था. उस ने तो साहिबा के मम्मो ऑर निप्पलो को काट काट कर सूजा दिया. आख़िर कुछ टाइम की चुदाई के बाद जुल्फिकार साहिबा की चूत में ही डिस्चार्ज हुआ और साहिबा के उपर ही लेट गया.
इस के बाद जुल्फिकार पूरी रात ना खुद सोया और ना ही साहिबा को सोने दिया और उसे हर ऐंगल से चोदा .कभी घोड़ी बना कर तो कभी खड़ा करके, कभी सीधा और कभी साइड से. सुहाग रात को जुल्फिकार ने साहिबा को सेक्स का एक ऐसा नया और मजेदार चस्का लगाया कि वो अपने शोहर और सेक्स की दिवानी हो गई.
साहिबा की शादी शुदा जिंदगी का आगाज़ बहुत अच्छा हुआ था और वो अपने ससुराल में बहुत खुश थी. हालाँकि साहिबा के ससुराल में किसी चीज़ की कोई कमी नही थी. मगर फिर भी साहिबा का दिल अपनी नौकरी छोड़ने को नही कर रहा था.
साहिबा ने जब अपने शोहर जुल्फिकार और ससुराल वालों से इस बारे में बात की. तो उस के शोहर या ससुराल वालों को उस की नोकरी जारी रखने पर कोई ऐतराज नही था. इसलिए शादी के बाद साहिबा ने अपना ट्रान्स्फर हॉस्पिटल रामपुर में करवा कर अपनी जॉब जारी रखी.
अपनी शादी के 6 महीने बाद ही साहिबा को इस बात का ईलम हो गया. कि अक्सर बड़े ज़मींदारों की तरह उस के शोहर जुल्फिकार भी उन के खेतों में काम करने वाले अपने मजदूरों की बिवीओ से लेकर गाँव की कई और औरतों से नाजायज़ ताल्लुक़ात रखते हैं.
साहिबा को इस बात के बारे में पता चलने के बाद दुख तो बहुत हुआ. लेकिन साहिबा ना तो अपने शोहर को इन कामों से रोक नही सकती थी. और ना ही उस में इतनी हिम्मत थी कि वो अपने शोहर से इस बारे में कोई बात भी करती. खुद एक ज़मींदार घराने से ताल्लुक होने की वजह से साहिबा ये बात खूब जानती थी. कि उन जैसे ज़मींदार घरानों में ये सब कुछ चलता है.
इसलिए साहिबा ने शुरू शुरू में ना चाहते हुए भी अपने शोहर के इन नाजायज़ कामों को नज़र अंदाज करना शुरू कर दिया. साहिबा की शादी को अभी 8 महीने ही गुज़रे थे कि एक दिन वो हॉस्पिटल से जल्दी घर आ गई.
साहिबा जब अपनी गाड़ी से उतार कर हवेली में आई तो हवेली में काफ़ी खामोशी थी. उस ने घर में काम करने वाली एक नौकरानी से पूछा कि सब लोग किधर हैं तो नौकरानी ने बताया कि उस के सास ससुर उस की दोनो ननदों के साथ सहर शॉपिंग के लिए गये हैं.
साहिबा काफ़ी थकि हुई थी इसलिए वो घर के उपर वाली मंज़िल पर अपने रूम की तरफ चल पड़ी. ज्यूँ ही साहिबा अपने रूम के पास पहुँची तो उसे अपने रूम से अजीब सी आवाज़े सुनाई दी. जिस को सुन कर साहिबा थोड़ी हेरान हुई.
साहिबा ने कमरे के बंद दरवाज़े को आहिस्ता से हाथ लगाया तो पता चला कि दरवाज़ा तो अंदर से बंद है. साहिबा को कुछ शक हुआ कि ज़रूर कोई गड़ बड है. उस ने की होल से कमरे के अंदर देखने की कोशिश की पर उसे कुच्छ नज़र नही आया.
इतनी देर में साहिबा को ख़याल आया कि कमरे के दूसरी तरफ एक खिड़की बनी हुई है. जिस पर एक परदा तो लगा हुआ है मगर वो कभी कभी हवा की वजह से थोड़ा हट जाता है. और अगर वो कोशिश करे तो उस जगह से वो कमरे के अंदर झाँक सकती है.
साहिबा ने इधर उधर नज़र दौड़ाई तो उसे एक कोने में एक पुरानी कुर्सी पड़ी हुई नज़र आई. साहिबा फॉरन गई और उस कुर्सी को कमरे की खिड़की के नीचे रखा और फिर खुद कुर्सी पर चढ़ गई. ये साहिबा की खुशकिस्मती थी या फिर बदक़िस्मती कि खिड़की का परदा वाकई थोड़ा सा हटा हुआ था.
जिस वजह से साहिबा को कमरे के अंदर झाँकने का मोका मिल गया. कमरे में नज़र डालते ही अंदर का मंज़र देख कर साहिबा की तो जैसे साँसे ही रुक गई. साहिबा ने देखा कि कमरे में उस के सुहाग वाले बेड पर उस का शोहर जुल्फिकार घर की एक नौकरानी को घोड़ी बना कर पीछे से चोद रहा था.
हालाँकि साहिबा ने अपने शोहर की इन हरकतों के बारे में बहुत पहले सुन तो बहुत कुछ रखा था. मगर आज तक वो इन बातों को सुन कर दिल ही दिल में कुढती रही थी. ये हक़ीकत है कि किसी बात या काम के बारे में सुनने और उस उस काम को अपनी आँखों के सामने होता हुआ देखने में बहुत फरक होता है. इसलिए आज अपनी आँखो के सामने और अपने ही बेड पर एक नौकरानी को अपने शोहर से चुदवाते हुए देख कर साहिबा के सबर का पैमाना लबरेज हो गया और वो गुस्से से पागल हो गई.
“जुल्फिकार ये आप क्या कर रहे हैं” साहिबा ने गुस्से में फुन्कार्ते हुए अपने शोहर को खिड़की से ही मुखातिब किया.
अपनी चोरी पकड़े जाने पर जुल्फिकार और नोकारानी की तो सिट्टी पिट्टी ही गुम हो गई.और उन दोनो के जिस्मों में से तो जैसे जान ही निकल गई. और उन दोनो ने अपनी चुदाई फॉरन रोक दी. जुल्फिकार को तो समझ ही नही आ रहा था कि वो क्या कहे और क्या करे.
“आप दरवाजा खोलिए में अंदर आ कर आप से बात करती हूँ” साहिबा ये कहती हुई कुर्सी से नीचे उतर कर कमरे की तरफ चल पड़ी. जितनी देर में साहिबा चक्कर काट कर कमरे के दरवाज़े पर पहुँची. जुल्फिकार नौकरानी को उस के कपड़े दे कर कमरे से रफू चक्कर कर चुका था.
जुल्फिकार ने साहिबा के कमरे में आने के बाद उस से अपने किए की माफी माँगनी चाही. मगर साहिबा आज ये सब कुछ अपनी नज़रों के सामने होता देख कर साहिबा अपने शोहर को किसी भी तौर पर माफ़ करने को तैयार नही थी.
उस दिन साहिबा और जुल्फिकार की पहली बार लड़ाई हुई और फिर साहिबा ने गुस्से में अपना समान पॅक किया और अपना घर छोड़ कर बनारस अपने माता पिता के पास चली आई. साहिबा और जुल्फिकार की नाराज़गी को एक महीने से ज़्यादा गुज़र गया और इस दौरान साहिबा अपने अम्मी अब्बू के घर में ही रही.
इस दौरान फॅमिली के बड़े बुजुर्गों ने साहिबा और जुल्फिकार को समझा बुझा कर उन दोनो की आपस में सुलह करवा दी और यूँ साहिबा को चार-ओ-नचार वापिस जुल्फिकार के पास आना ही पड़ा. अभी साहिबा को दुबारा अपने शोहर के पास वापिस आए हुए चार महीने गुज़र चुके थे.
वैसे तो साहिबा ने घर के बुजुर्गों के कहने पर अपने शोहर से सुलह तो कर ली थी. मगर साहिबा को अब अपने शोहर से वो पहले वाला लगाव और प्यार नही रहा था. जुल्फिकार अब भी उसे हफ्ते में एक दो बार चोदता था. मगर साहिबा चूँकि अभी तक नोकरानि वाली वाकिये को भुला नही पा रही थी.
इसलिए उसे अब जुल्फिकार के साथ चुदाई का वो पहले जैसा मज़ा नही आता था. लेकिन अब कुछ भी हो उसे एक फर-मा-बर्दार बीवी बन कर अपनी जिंदगी तो गुज़ारना थी. इसलिए वो इस वकिये को भुलाने के लिए चुप चाप अपनी लाइफ में बिजी हो गई.
हॉस्पिटल में काम के दौरान साहिबा ये बात अच्छी तरह जानती थी. कि उस के कुछ मेल साथी डॉक्टर्स हॉस्पिटल की नर्सों को ड्यूटी के दौरान चोदते हैं. बनारस में अपनी हाउस जॉब और फिर रामपुर में शादी के बाद भी उस के कुछ साथी डॉक्टर्स ने साहिबा के साथ जिन्सी ताल्लुक़ात कायम करने की कोशिश की थी. मगर हर दफ़ा साहिबा ने उन की ये ऑफर ठुकरा दी.
अब जब से साहिबा ने अपने शोहर को रंगे हाथों अपनी नौकरानी को चोदते हुए पकड़ा था. तब से साहिबा के दिल ही दिल में एक बग़ावत जनम लेने लगी थी. अब नज़ाने क्यों उस का दिल चाह रहा था. कि जिस तरह उस के शोहर ने शादी के बाद भी दूसरी औरतों से नाजायज़ ताल्लुक़ात रख कर साहिबा के प्यार की तोहीन की है.
इसी तरह क्यों ना साहिबा भी किसी और मर्द से चुदवा कर अपने शोहर से एक किस्म का इंतिक़ाम ले. साहिबा के दिल में इस तरहके बागी याना ख़यालात जनम तो लेने लगे थे. लेकिन सौ बार सोचने के बावजूद साहिबा जैसी शरीफ लड़की में इस किस्म के ख़यालात को अमली-जामा पहना ने की कभी हिम्मत नही पड़ी थी.
फिर साहिबा की जिंदगी में अंजाने और हादसती तौर पर एक ऐसा वाकीया हुआ जिस ने साहिबा की जिंदगी में सब कुछ बदल कर रख दिया. साहिबा का ससुराली गाँव रामपुर से तक़रीबन एक घंटे की दूरी पर है. साहिबा के शोहर और ससुराल वाले गाँव में रहने के बावजूद खुले ज़हन के लोग हैं और वो आम लोगो की तरह अपने घर की औरतों पर किसी किस्म की सख्ती नही करते.
इसलिए साहिबा खुद ही अपनी कार ड्राइव कर के रोज़ाना अपने गाँव से शहर अपनी जॉब पर आती जाती थी. जिस पर उस के शोहर और ससुराल वालो को किसी किसम का कोई ऐतराज नही था. साहिबा की ड्यूटी ज़्यादा तर सुबह के टाइम ही होती. और वो अक्सर शाम का अंधेरा होने से पहले पहले अपने गाँव वापिस चली आती.
ये सिलसला कुछ दिन तो ठीक चलता रहा. मगर फिर कुछ टाइम बाद साहिबा के हॉस्पिटल के दो डॉक्टर्स का एक ही साथ दूसरे शहरो में तबादला हो गया. जिस की वजह से हॉस्पिटल में काम का बोझ बढ़ गया और अब साहिबा को जॉब से फारिग होते होते रात को काफ़ी देर होने लगी.
चूँकि साहिबा के गाँव का रास्ता रात के वक़्त महफूज नही था. जिस की वजह से साहिबा के शोहर जुल्फिकार साहिबा का रात के वक़्त अकेले घर वापिस आना पसंद नही करते थे. इसलिए जब कभी भी साहिबा लेट होती तो वो अपने शोहर को फोन कर के बता देती.
तो फिर या तो साहिबा के शोहर खुद साहिबा को लेने हॉस्पिटल पहुँच जाते. या फिर गाँव से अपने ड्राइवर को साहिबा को लेने के लिए भेज देते. इसी दौरान साहिबा के छोटे भाई आज़म ने भी अपनी एमबीबीएस की स्टडी मुकम्मल कर ली तो उस की हाउस जॉब भी रामपुर में साहिबा के ही हॉस्पिटल में स्टार्ट हो गई.
साहिबा ने अपने भाई आज़म को अपने घर में आ कर रहने की दावत दी. मगर आज़म ना माना और उस ने हॉस्पिटल के पास ही एक छोटा सा फ्लॅट किराए पे लिए लिया. उस फ्लॅट में एक बेड रूम वित अटेच्ड बाथरूम था.जिस के साथ एक छोटा सा किचन और लिविंग रूम था. जो कि आज़म की ज़रूरत के हिसाब से काफ़ी था.
अब आज़म के अपनी बहन साहिबा के हॉस्पिटल में जॉब करने की वजह से साहिबा को एक सहूलियत ये हो गई. कि जब कभी एमर्जेन्सी की वजह से साहिबा को रात के वक़्त देर हो जाती.या साहिबा का शोहर या ड्राइवर रात को किसी वजह से उसे लेने ना आ पाते तो साहिबा गाँव अकेले जाने की बजाय वो रात अपने छोटे भाई आज़म के पास उस के फ्लॅट में ही रुक जाती.
स्टार्ट में आज़म की ड्यूटी रात में होती और साहिबा दिन में ड्यूटी करती थी. इसलिए जब कभी भी साहिबा आज़म के फ्लॅट पर रुकती तो एक वक़्त में उन दोनो बहन भाई में से कोई एक ही फ्लॅट पर होता था. फिर कुछ टाइम गुज़रने के बाद आज़म की ड्यूटी भी चेंज हो कर सुबह की ही हो गई.
आज़म की ड्यूटी का टाइम चेंज होने से अब मसला ये हो गया कि जब साहिबा एक आध दफ़ा लेट ऑफ होने की वजह से आज़म के पास रुकी तो फ्लॅट में एक ही बेड होने की वजह से आज़म को कमरे के फर्श पर बिस्तर लगा कर सोना पड़ा.
एक बहन होने के नाते साहिबा ये बात बखूबी जानती थी कि आज़म को बचपन ही से फर्श पर बिस्तर लगा कर सोने से नींद नही आती थी. आज़म ने एक आध दफ़ा तो जैसे तैसे कर के फर्श पर बिस्तर लगा कर रात गुज़ार ही ली.
फिर कुछ दिनो बाद आज़म ने साहिबा को बताए बगैर एक और बेड खरीदा और उस को ला कर अपने बेड रूम में रख दिया. चूं कि साहिबा तो कभी कभार ही आज़म के फ्लॅट पर रुकती थी. इसलिए जब आज़म ने अपनी बहन से दूसरा बेड खरीदने का ज़िक्र किया तो साहिबा को उस का दूसरा बेड खरीदने वाली हरकत ना जाने क्यों एक फज़ूल खर्ची लगी.
जिस पर साहिबा आज़म से थोड़ा नाराज़ भी हुई. फिर दूसरे दिन साहिबा ने अपने भाई के फ्लॅट में जा कर बेड रूम में रखे हुए बेड का मुआयना किया तो पता चला कि चूँकि बेड रूम का साइज़ पहले ही थोड़ा छोटा था. इसलिए जब कमरे में दूसरा बेड रख गया तो रूम में जगह कम पड़ गई. जिस की वजह से कमरे में रखे हुए दोनो बेड एक दूसरे के साथ मिल से गये थे.
साहिबा “आज़म ये क्या तुम ने तो बेड्स को आपस में बिल्कुल ही जोड़ दिया है बीच में थोड़ा फासला तो रखते.”
आज़म: “में क्या करता कमरे में जगह ही बहुत कम है बाजी”
“चलो गुज़ारा हो जाए गा, मैने कौन सा इधर रोज सोना होता है” कहती हुई साहिबा कमरे से बाहर चली आई.
वैसे तो हर रोज साहिबा की पूरी कोशिस यही होती कि वो रात को हर हाल में अपने घर ज़रूर पहुँच जाय .मगर कभी कबार ऐसा मुमकिन नही होता था. इस के बाद फिर जब कभी साहिबा अपने भाई के पास रात को रुकती. तो वो दोनो बहन भाई रात देर तक बैठ कर अपने घर वालो और अपने रिश्तेदारों के बारे में बातें करते रहते.
इस तरह साहिबा का अपने भाई के साथ टाइम बहुत अच्छा गुज़र जाता था. ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे. कहते हैं ना कि वक़्त सब से बड़ा मरहम होता है. इसलिए हर गुज़रते दिन के साथ साथ साहिबा का रवईया आहिस्ता आहिस्ता अपने शोहर से दुबारा थोड़ा बहतर होने लगा था.
उन दिनो गन्नों की बुआई का सीज़न चल रहा था. जिस वजह से जुल्फिकार दिन रात अपने खेतों में बिजी रहते थे. इसलिए पिछले दो हफ्तों से वो और साहिबा आपस में चुदाई नही पाए थे. लेकिन आज सुबह जब साहिबा गाड़ी में बैठ कर हॉस्पिटल के लिए निकल रही थी. तो जुल्फिकार उस के पास आ कर कहने लगा कि काम ख़तम हो गया है और अब में फ्री हूँ. फिर उस ने आँख दबा कर साहिबा को इशारा किया “आज रात को” और खुद ही हंस पड़ा.
साहिबा ने जुल्फिकार की बात का कोई जवाब नही दिया और खामोशी से अपनी गाड़ी चला दी. बेशक साहिबा जुल्फिकार के सामने खामोश रही थी. मगर हॉस्पिटल की तरफ गाड़ी दौड़ाते हुए साहिबा ने बेखयाली में जब अपनी चूत पर खारिश की. तो उसे अपनी टाँगों के बीच अपनी चूत बहुत गीली महसूस हुई.
साहिबा समझ गई कि अंदर ही अंदर आज काफ़ी टाइम बाद उस की फुद्दी को खुद ब खुद लंड की तलब हो रही थी. उस रोज ना चाहते हुए भी बे इकतियार साहिबा सारा दिन बार बार अपनी घड़ी को देखती रही कि कब दिन ख़तम हो और कब वो घर जाय और अपने शोहर का लंड अपनी फुद्दी में डलवाए.
आज उस के दिल में एक अजीब सी एग्ज़ाइट्मेंट थी. और उस दिन दोपहर के बाद दो मेजर सर्जरी भी थीं सो काम भी बहुत था. खैर दूसरी सर्जरी के दौरान साहिबा को उम्मीद से ज़यादा टाइम लग गया और वो बुरी तरह थक भी गई थी. दो घंटे और थे और फिर वो होती और उस का शोहर और पूरी रात…
रात को अचानक साहिबा की आँख खुली. उस का बदन कमरे में गर्मी की शिद्दत से पसीना पसीना हो रहा था. साहिबा को अहसास हुआ कि उस की कमीज़ उतरी हुई है और वो सिर्फ़ ब्रा और शलवार में अपने बेड पर लेटी हुई है.
गर्मी की शिद्दत की वजह से ना जाने कब और कैसे साहिबा ने अपनी कमीज़ उतार दी इस का उसे खुद भी पता नही चला. साहिबा अभी भी नींद की खुमारी में थी और इस खुमारी में साहिबा ने महसूस किया उस के हाथ में उस के शोहर का लंड था.
जिसे वो खूब सहला रही थी. और शलवार में मौजूद उस के शोहर का लंड साहिबा के हाथों में झटके मार रहा था. इतने में रुबीना का दूसरा हाथ जुल्फिकार के पेट से हल्का सा टच हुआ तो साहिबा को अंदाज़ा हुआ कि उस की तरह उस के शोहर की कमीज़ भी उतरी हुई है.
साहिबा अपने शोहर के लंड को अपने काबू में पा कर मुस्कराने लगी मगर सोते हुए भी उसने लंड को नही छोड़ा. कमरे में अंधेरा था. जिस की वजह से कोई भी चीज़ दिखाई नही दे रही थी. मगर साहिबा को कमरे में गूँजती हुई अपने हज़्बेंड की तेज तेज़ सांसो से पता चल रहा था कि वो भी जाग रहे हैं.
साहिबा ने अपने शोहर के लंड पर नीचे से उपर तक हाथ फेरा तो उस के शोहर के मुँह से एक ज़ोरदार सी “सस्स्स्स्स्स्सस्स” सिसकारी निकली गई. सिसकारी की आवाज़ से लगता था आज साहिबा का शोहर कुछ ज़यादा ही गरम हो रहा था.
साहिबा को भी अपने हाथ में थामा हुआ अपने शोहर का लंड आज कुछ ज़यादा ही लंबा, मोटा और सख़्त लग रहा था. खास कर लंड की मोटाई से तो आज ऐसे महसूस हो रहा था कि लंड जैसे फूल कर डबल हो गया हो. साहिबा को पूरे दिन की सख़्त मेहनत का अब फल मिल रहा था.
वो आज पूरा दिन हॉस्पिटल में बहुत ही बिजी रही थी. और फिर शाम को दूसरी सर्जरी में कॉंप्लिकेशन्स की वजह से साहिबा को हॉस्पिटल में काफ़ी देर हो गई थी और साहिबा को ऐसे लग रहा था कि वो आज रात अपने घर नही जा पाएगी… इतनी रात…. इतनी रात…..
अचानक साहिबा के दिमाग़ ने झटका खाया और वो नीद से पूरी तरह जाग गई. उफ्फ रात को तो में बहुत लेट हो गयी थी और फिर मेने घर फोन किया था कि में घर नही आ पाऊँगी… फिर में अपने भाई के फ्लॅट पर…. सोते सोते ये सोच कर ही अचानक साहिबा के पूरे जिस्म में एक झुरझरी सी दौड़ गई….
“में अपने शोहर के साथ नही…. बल्कि मे अपने सगे भाई….. नही नही नही….. नही…………” सर्दी की ठंडी रात में भी साहिबा का बदन पसीने से तरबतर हो गया.
“ये हुआ कैसे” साहिबा सोच रही थी.
जब वो आज़म के फ्लॅट में आई थी तो उस का भाई सोया हुया था. फ्लॅट की एक चाभी साहिबा पास भी थी. साहिबा ने दरवाज़ा खोला और कपड़े चेंज किए बिना ही लेट गई और लेटते ही उसे नींद आ गई. फ्लॅट में आते वक़्त साहिबा इतना थकि हुई थी. जिस की वजह से उसे डर था कि नींद के मारे वो कहीं रास्ते में ही ना गिर जाए.
तो फिर क्या रात में भाई ने. “नही, एसा नही हो सकता… मेरा भाई एसा नही है! तो फिर कैसे?”
साहिबा सोच रही थी… “कैसे मेरे हाथ में अपने भाई का लंड आ गया … अगर उसने कोई ग़लत हरकत नही की.”
साहिबा ने जब आँखे खोल कर गौर से देखा तो उसे अंदाज़ा हुआ कि रात को नींद की वजह से वो करवटें बदलते बदलते ना जाने किस तरह अपने भाई के बेड पर चली आई है. हालाँकि दोनो बेड पूरे जुड़े हुए नही थे. लेकिन वो इतने करीब थे कि नींद में करवटें बदलते हुए इंसान एक बेड से दूसरे बेड पर ब आसानी जा सकता था.
“तो इसका मतलब में ही… अपने भाई के बेड पर…. उसका लंड हाथ में लेकर ….उफफफफफफफफ्फ़ नही…वो क्या सोचता होगा मेरे बारे में?…. साहिबा अपनी नींद के खुमार में अपने आप से ही बातें किए जा रही थी.
साहिबा ने अपने भाई की तरफ से कोई हलचल महसूस नही की. लगता था शायद आज़म को अंदाज़ा हो गया था कि उस की बहन साहिबा अब शायद जाग गयी है और ये जो कुछ उन के बीच हुआ वो सब नींद में होने की वजह से हो गया था. दोनो बहन भाई के बीच में मुश्किल से दो फीट का फासला होगा और वो दोनो चुप चाप लेटे हुए थे.
साहिबा की समझ में कुछ नही आ रहा था कि वो क्या करे. वो ये सोच कर शर्म से पानी पानी हो रही कि उस का भाई उस के बारे में क्या सोचेगा. कमरे में बिल्कुल सन्नाटा था. रह रह का साहिबा अपने दिल-ओ-दिमाग़ में अपने आप को मालमत कर रही थी.
”ये तूने क्या कर दिया? अब आज़म क्या सोचता होगा? मेरी बड़ी बहन एसी है… अपने भाई के लंड को…?
साहिबा अभी इन ही सोचो में गुम थी कि उसे एक और झटका लगा. साहिबा ने अभी भी अपने भाई का लंड पकड़ा हुआ था. जब कि उसे नींद से जागे हुए कोई पंद्रह मिनिट हो गये थे. साहिबा ने सोचा कि वो जल्दी से अपना हाथ आज़म के लंड से हटा ले मगर उस वक़्त सूरतेहाल एसी थी कि वो चाहते हुए भी एसा भी न कर सकी. साहिबा डर रही थी कि अगर वो कोई हरकत करती है तो उस का भाई कुछ बोल ना पड़े.
“क्या करूँ” साहिबा ये सोच रही थी मगर उस की समझ में कुछ नही आ रहा था. ऐसे ही पड़े पड़े कोई एक आध मिनिट और गुज़र गया और साहिबा का हाथ अभी तक आज़म के लंड पर था. आज़म का लंड अब कुछ ढीला हो गया था मगर फिर भी साहिबा को अपने भाई आज़म का लंड साइज़ में काफ़ी बड़ा महसूस हो रहा था.
आधी रात को अंधेरे कमरे में बेड पर साथ साथ सीधे लेटे दोनो बहन भाई जाग तो रहे थे. मगर उन दोनो में कोई नही जानता था कि वो अब करें तो क्या करें.
“जुल्फिकार के लंड के मुक़ाबले में आज़म का लंड काफ़ी लंबा मोटा है” उफफफ्फ़ में भी क्या सोच रही हूँ अपने ही भाई के लंड के बारे में…. साहिबा ने अपने आप को कोसा. मगर सच में है तो बहुत बड़ा…. उफ्फ पूरा खड़ा हो कर तो…… मुझे एसा नही सोचना चाहिए साहिबा ने अपने आप को फिर डांता.
“भाई तो तस्सली करा देता होगा सच में…. हाईए कितना लंबा है मोटा तो बाप रेरर….किसी कंवारी लड़की की तो….” सोचते सोचते कब साहिबा ने अपना हाथ आज़म के लंड के गिर्द कस दिया, उसे पता ही ना चला. साहिबा के हाथ ने जैसे ही आज़म के लंड को कसा तो आज़म के मुँह से सिसकारी फुट पड़ी. और उस के सोते हुए लंड ने फिर झटका खाया और फिर से एक दाम खड़ा होने लगा.
आज़म की सिसकी को सुन कर साहिबा एक दम हडबडा कर अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर निकल आई और उस ने फॉरन अपने भाई के लंड को अपने हाथ से छोड़ दिया. मगर जब एक जवान कुँवारा मर्द हो और साथ मे एक खूबसूरत जवान शादी शुदा औरत जो उस की सग़ी बहन हो.
और वो औरत जब रात की तन्हाई में एक ही बिस्तर पर आधी नंगी लेटी हुई उस जवान मर्द के लंड को सहला रही हो. तो एक भाई होने के बावजूद आज़म अपने आप को कैसे काबू में कैसे रखता. इसलिए जब आज़म ने अपने लंड को अपनी बहन के हाथ से निकलता हुआ महसूस किया तो उस ने फॉरन ही साहिबा की तरफ करवट बदली.
आज़म ने साहिबा को पकड़ कर अपनी तरफ कैंचा और फिर अपनी बहन के हाथ को पकड़ कर उसे दुबारा अपने लंड पर रख दिया. साथ ही आज़म का लेफ्ट हॅंड सरकता हुआ साहिबा की टाँगो के बीच आया और उस ने अपना हाथ पहली बार अपनी बहन की शादी शुदा चूत पर रख दिया.
आज़म का हाथ फुद्दी पर लगते ही साहिबा का बदन अकड सा गया. साहिबा ने आज़म को रोकने के लिए थोड़ी मज़ामत करते हुए आज़म के हाथ को अपनी चूत से हटाने की कोशिश की. मगर वो उसे रोक नही पाई और आज़म का हाथ बेताबी से अपनी बहन की फूली हुई चूत पर फिसलता रहा.
साहिबा पिछले दो हफ्तों से अपने शोहर जुल्फिकार से नही चुदि थी इसलिए आज साहिबा के बदन मे आग लगी हुई थी. और उस की फुद्दि से पानी बहने लगा था. साहिबा की फुद्दि लंड माँग रही थी और लंड साहिबा के हाथ मे था..
उस के अपने सगे छोटे भाई का लंबा चौड़ा लंड. जवानी की गर्मी और सेक्स की हवस ने उन दोनो बहन भाई की सोचने और समझने की सालिहात जैसी ख़तम कर दी थी और शरम का परदा गिरना सुरू हो गया था. आज़म के हाथ उस की बहन की पानी छोड़ती हुई फुद्दी से खेलने में मसरूफ़ रहे. जिन के असर से साहिबा का बदन अब ढीला पड़ने लगा.
जब आज़म ने महसूस किया कि उस की बहन थोड़ी ढीली पड़ गई है तो उस का होसला भी बढ़ गया. और उस का हाथ अपनी बहन की फुद्दी को छोड़ कर उस के मम्मे पर आया और ब्रा के उपर से अपनी बहन के जवान तने हुए मम्मो पर हाथ फेरने लगा.
उधर आज़म के बहकते हाथों ने साहिबा की फुद्दी में भी हलचल मचा दी थी. इसलिए उस को भी अब अपने आप पर कंट्रोल नही रहा और फिर साहिबा का हाथ भी खुद ब खुद तेज़ तेज़ उस के अपने भाई के लंड पर दुबारा चलने लगा. उपर से नीचे तक साहिबा अपने भाई के लंड को मुट्ठी में भर कर निचोड़ रही थी.
अब आज़म ने अपने हाथ से साहिबा के मम्मे को मसलने शुरू कर दिए, जितना ज़ोर से वो साहिबा के मम्मे को मसलता उतने ही ज़ोर से उस की बहन साहिबा उस के लंड को पकड़ कर खींचती और दबाती. ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरे कमरे में दोनो बहन भाई आपस में कोई मुकाबला कर रहे हों. पूरे कमरे में दोनो की आहें, कराहें और सिसकियाँ गूँज रही थीं.
आज़म ने साहिबा को थोड़ा सा उठाया और उस ने अपने हाथ साहिबा की कमर पर ले जा कर अपनी बहन के ब्रा की हुक खोल दी. बहन के ब्रा की हुक खोलते ही एक बेसबरे बच्चे की तरह आज़म ने ब्रा को खींच कर निकाला और अपनी बहन के बदन से दूर फेंक दिया. अब साहिबा अपने भाई के सामने कमर से उपर पूरी नंगी थी.
हालाँकि कमरे में बहुत अंधेरा था लेकिन साहिबा अपने भाई की नज़रें अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी. आज़म ने अपना मुँह नीचे झुकाया और अपनी बहन के राइट मम्मे को जीभ से चाटने लगा. भाई का मुँह अपने मम्मे पर लगते ही साहिबा तो जैसे सिहर उठी. उस ने अपने भाई का सिर पकड़ कर अपने मम्मे पर दबाया तो आज़म ने मुँह खोला और अपनी बहन के तने हुए निपल को मुँह लगा कर चूसने लग गया.
अगले भाग में आगे की कहानी जारी रहेगी!... आप सभी के मेल का स्वागत है।
साहिबा के उस के अलावा एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई हैं. साहिबा की बहन मुमताज उस से एक साल बड़ी है.जब कि उस का भाई आज़म अहमद साहिबा से एक साल छोटा है. साहिबा ने मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद बनारस के सरकारी हॉस्पिटल में हाउस जॉब स्टार्ट कर दी.
पढ़ाई के दौरान ही साहिबा के वालदान ने दोनो बहनों की शादी के लिए रिश्ता पक्का कर दिया था और फिर एमबीबीएस करने के तकरीबन एक साल बाद साहिबा और उस की बहन की एक ही दिन शादी हो गई. साहिबा की बहन मुमताज तो शादी के फॉरन बाद अपने हज़्बेंड के साथ मारीशस चली गई. जब के साहिबा ब्याह कर रामपुर के करीब एक गाँव में चली आई.
साहिबा के हज़्बेंड जुल्फिकार अपने इलाक़े के एक बहुत बड़े ज़मींदार थे. साहिबा ने मेडिकल कॉलेज के हॉस्टिल में रहने के दौरान अपनी कुछ क्लास फेलो लड़कियों के मुक़ाबले शादी से पहले अपने आप को सेक्स से दूर रखा था. इसलिए साहिबा अपनी शादी की रात तक बिल्कुल कंवारी थी.
शादी के बाद साहिबा सुहाग रात को अपने रूम में सजी सँवरी बैठी थी. जुल्फिकार कमरे में आए और साहिबा के पास आ कर बेड पर बैठ गये. साहिबा जो कि अपना घूँघट निकाल कर मसेहरी पर बैठी हुई थी. वो अपने शोहर जुल्फिकार को अपने साथ बेड पर बैठा हुआ महसूस कर के शरम के मारे अपने आप में और भी सिकुड सी गई.
जुल्फिकार ने जब साहिबा को यूँ शरमाते देखा तो कहने लगा कि साहिबा मेरी जान आज मुझ से शरमाओ मत अब में कोई गैर थोड़े ही हूँ तुम्हारे लिए अब तो हम दोनो मियाँ बीवी हैं. फिर थोड़ी देर जुल्फिकार ने साहिबा से इधर उधर की बाते कीं. जिस की वजह से साहिबा की जुल्फिकार से झिझक थोड़ी कम होने लगी.
थोड़ी देर बातें करने के बाद जुल्फिकार ने जब देखा कि अब साहिबा थोड़ी कम शरमा रही है तो उस ने आगे बढ़ कर साहिबा के गुदाज बदन को अपनी बाहों में भर लिया. जिस की वजह से साहिबा तो शरम से और सिमट कर रह गई.
एक मर्द का हाथ अपने जिश्म से पहली बार टच होता महसूस करके रुबीना के जिश्म में एक मस्ती सी छाने लगी। मकसूद ने रुबीना को ऊपर किया और पहले रुबीना के बालों के जूड़े को खोला और फिर रुबीना की ज्वेलरी उतारनी शुरू कर दी। ज्वेलरी उतारने के बाद मकसूद ने रुबीना के होंठों को किस किया।
ज्यों ही मकसूद के होंठ रुबीना के होंठों से मिले तो रुबीना के जिश्म में गर्मी की एक ऐसी लहर उठी, जो एक पल में सीधे उसके कोमल मम्मों के निपलों को खड़ा करती हुई उसकी सील-बंद चूत तक पहुँच गई, और उसकी चूत को पानी-पानी कर गई।
रुबीना भी आखीरकार, एक जवानी से भरपूर लड़की थी। जिसने अपनी शादीशुदा सहेलियों से सुहागरात के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। उसके दिल में भी शादी की पहली रात के कुछ अरमान थे। इसलिये वो भी अपनी शर्मो हया को भुलाकर कुछ ही देर बाद मकसूद का साथ देने लगी।
मकसूद के होंठों और उसकी गरमजोश हरकतों ने रुबीना को मदहोश कर दिया, और इस मदहोशी के आलम में उसे पता ही नहीं चला की कब और कैसे मकसूद ने उसे और अपने आपको कपड़ों की कैद से आजाद कर दिया था। रुबीना ने जब पहली बार अपने शौहर को इस तरह अपने सामने पूरा नंगा देखा तो उसने शर्म के मारे अपनी नजरें झुका ली।
पलंग पर रुबीना मकसूद के सामने पूरी नंगी बैठी हुई थी। रुबीना के खूबसूरत कोरे बदन को देखकर मकसूद की आँखों में चमक आ गई। मकसूद ने एक पल अपनी बीवी के जिश्म का गौर से भरपूर जायजा लिया, और फिर रुबीना के जवान ब्राउन निपल को मुँह में भरकर चूसने लगा।
अपने निपलों पर मकसूद का मुँह करते ही रुबीना सिसक गई। और फिर कमरे में वो खेल शुरू हुवा जो हर नये मियां-बीवी अपनी शादी की पहली रात को एक दूसरे के साथ करते हैं। मकसूद ने रुबीना के गालों, होंठों और मम्मों को चूस-चूसकर और अपनी उंगलियों के साथ उसकी कुँवारी चूत से खेलकर रुबीना को मजे से बेहाल कर दिया।
काफी देर अपनी बीवी के जिश्म को प्यार करने के बाद मकसूद ने रुबीना की टांगों को फैलाया और फिर अपना लण्ड रुबीना की कुँवारी फुद्दी पर रखा और धीरे-धीरे अंदर डालने की कोशिश करने लगा। रुबीना की कुँवारी चूत अपने शौहर का बड़ा लण्ड ले ही नहीं पा रही थी, और वो चिल्ला उठी- “हाईई नहीं मकसूद आह्ह… प्लीज़्ज़… निकाल दो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है…” और अपने शौहर को रुकने का कह रही थी।
मगर मकसूद उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था। मकसूद ने एक झटका दिया और पूरा लण्ड अपनी बीवी की चूत में डाल दिया। दर्द की शिद्दत से रुबीना के तो आँसू ही निकल गये। पर वो चीख भी नहीं सकी। क्योंकी मकसूद ने रुबीना के मुँह में मुँह डालकर उसके मुँह को बंद कर दिया था।
जब दर्द की शिद्दत थोड़ा कम हुई तो मकसूद ने अपना मुँह रुबीना के मुँह से हटाते हुये कहा- “ऐसा करना पड़ता है, वर्ना तुम दर्द नहीं सह पाती। अब आगे दर्द नहीं होगा। क्योंकी अब तुम्हारी सील फट गई है, और उसमें से खून भी निकल रहा है…” फिर मकसूद ने अपने झटकों की स्पीड बढ़ा दी।
अब रुबीना को भी दर्द कम होने के साथ-साथ मजा आने लगा और वो सिसकते हुये कहती रही- “जानू धीरे डालो मजा आने लगा है…”
जुल्फिकार अपनी बीवी की बात सुन के जोश में आ गया और तेज़ तेज़ झटके देने लगा और साथ ही साहिबा के मम्मो और निपल्स को भी काट रहा था. उस ने तो साहिबा के मम्मो ऑर निप्पलो को काट काट कर सूजा दिया. आख़िर कुछ टाइम की चुदाई के बाद जुल्फिकार साहिबा की चूत में ही डिस्चार्ज हुआ और साहिबा के उपर ही लेट गया.
इस के बाद जुल्फिकार पूरी रात ना खुद सोया और ना ही साहिबा को सोने दिया और उसे हर ऐंगल से चोदा .कभी घोड़ी बना कर तो कभी खड़ा करके, कभी सीधा और कभी साइड से. सुहाग रात को जुल्फिकार ने साहिबा को सेक्स का एक ऐसा नया और मजेदार चस्का लगाया कि वो अपने शोहर और सेक्स की दिवानी हो गई.
साहिबा की शादी शुदा जिंदगी का आगाज़ बहुत अच्छा हुआ था और वो अपने ससुराल में बहुत खुश थी. हालाँकि साहिबा के ससुराल में किसी चीज़ की कोई कमी नही थी. मगर फिर भी साहिबा का दिल अपनी नौकरी छोड़ने को नही कर रहा था.
साहिबा ने जब अपने शोहर जुल्फिकार और ससुराल वालों से इस बारे में बात की. तो उस के शोहर या ससुराल वालों को उस की नोकरी जारी रखने पर कोई ऐतराज नही था. इसलिए शादी के बाद साहिबा ने अपना ट्रान्स्फर हॉस्पिटल रामपुर में करवा कर अपनी जॉब जारी रखी.
अपनी शादी के 6 महीने बाद ही साहिबा को इस बात का ईलम हो गया. कि अक्सर बड़े ज़मींदारों की तरह उस के शोहर जुल्फिकार भी उन के खेतों में काम करने वाले अपने मजदूरों की बिवीओ से लेकर गाँव की कई और औरतों से नाजायज़ ताल्लुक़ात रखते हैं.
साहिबा को इस बात के बारे में पता चलने के बाद दुख तो बहुत हुआ. लेकिन साहिबा ना तो अपने शोहर को इन कामों से रोक नही सकती थी. और ना ही उस में इतनी हिम्मत थी कि वो अपने शोहर से इस बारे में कोई बात भी करती. खुद एक ज़मींदार घराने से ताल्लुक होने की वजह से साहिबा ये बात खूब जानती थी. कि उन जैसे ज़मींदार घरानों में ये सब कुछ चलता है.
इसलिए साहिबा ने शुरू शुरू में ना चाहते हुए भी अपने शोहर के इन नाजायज़ कामों को नज़र अंदाज करना शुरू कर दिया. साहिबा की शादी को अभी 8 महीने ही गुज़रे थे कि एक दिन वो हॉस्पिटल से जल्दी घर आ गई.
साहिबा जब अपनी गाड़ी से उतार कर हवेली में आई तो हवेली में काफ़ी खामोशी थी. उस ने घर में काम करने वाली एक नौकरानी से पूछा कि सब लोग किधर हैं तो नौकरानी ने बताया कि उस के सास ससुर उस की दोनो ननदों के साथ सहर शॉपिंग के लिए गये हैं.
साहिबा काफ़ी थकि हुई थी इसलिए वो घर के उपर वाली मंज़िल पर अपने रूम की तरफ चल पड़ी. ज्यूँ ही साहिबा अपने रूम के पास पहुँची तो उसे अपने रूम से अजीब सी आवाज़े सुनाई दी. जिस को सुन कर साहिबा थोड़ी हेरान हुई.
साहिबा ने कमरे के बंद दरवाज़े को आहिस्ता से हाथ लगाया तो पता चला कि दरवाज़ा तो अंदर से बंद है. साहिबा को कुछ शक हुआ कि ज़रूर कोई गड़ बड है. उस ने की होल से कमरे के अंदर देखने की कोशिश की पर उसे कुच्छ नज़र नही आया.
इतनी देर में साहिबा को ख़याल आया कि कमरे के दूसरी तरफ एक खिड़की बनी हुई है. जिस पर एक परदा तो लगा हुआ है मगर वो कभी कभी हवा की वजह से थोड़ा हट जाता है. और अगर वो कोशिश करे तो उस जगह से वो कमरे के अंदर झाँक सकती है.
साहिबा ने इधर उधर नज़र दौड़ाई तो उसे एक कोने में एक पुरानी कुर्सी पड़ी हुई नज़र आई. साहिबा फॉरन गई और उस कुर्सी को कमरे की खिड़की के नीचे रखा और फिर खुद कुर्सी पर चढ़ गई. ये साहिबा की खुशकिस्मती थी या फिर बदक़िस्मती कि खिड़की का परदा वाकई थोड़ा सा हटा हुआ था.
जिस वजह से साहिबा को कमरे के अंदर झाँकने का मोका मिल गया. कमरे में नज़र डालते ही अंदर का मंज़र देख कर साहिबा की तो जैसे साँसे ही रुक गई. साहिबा ने देखा कि कमरे में उस के सुहाग वाले बेड पर उस का शोहर जुल्फिकार घर की एक नौकरानी को घोड़ी बना कर पीछे से चोद रहा था.
हालाँकि साहिबा ने अपने शोहर की इन हरकतों के बारे में बहुत पहले सुन तो बहुत कुछ रखा था. मगर आज तक वो इन बातों को सुन कर दिल ही दिल में कुढती रही थी. ये हक़ीकत है कि किसी बात या काम के बारे में सुनने और उस उस काम को अपनी आँखों के सामने होता हुआ देखने में बहुत फरक होता है. इसलिए आज अपनी आँखो के सामने और अपने ही बेड पर एक नौकरानी को अपने शोहर से चुदवाते हुए देख कर साहिबा के सबर का पैमाना लबरेज हो गया और वो गुस्से से पागल हो गई.
“जुल्फिकार ये आप क्या कर रहे हैं” साहिबा ने गुस्से में फुन्कार्ते हुए अपने शोहर को खिड़की से ही मुखातिब किया.
अपनी चोरी पकड़े जाने पर जुल्फिकार और नोकारानी की तो सिट्टी पिट्टी ही गुम हो गई.और उन दोनो के जिस्मों में से तो जैसे जान ही निकल गई. और उन दोनो ने अपनी चुदाई फॉरन रोक दी. जुल्फिकार को तो समझ ही नही आ रहा था कि वो क्या कहे और क्या करे.
“आप दरवाजा खोलिए में अंदर आ कर आप से बात करती हूँ” साहिबा ये कहती हुई कुर्सी से नीचे उतर कर कमरे की तरफ चल पड़ी. जितनी देर में साहिबा चक्कर काट कर कमरे के दरवाज़े पर पहुँची. जुल्फिकार नौकरानी को उस के कपड़े दे कर कमरे से रफू चक्कर कर चुका था.
जुल्फिकार ने साहिबा के कमरे में आने के बाद उस से अपने किए की माफी माँगनी चाही. मगर साहिबा आज ये सब कुछ अपनी नज़रों के सामने होता देख कर साहिबा अपने शोहर को किसी भी तौर पर माफ़ करने को तैयार नही थी.
उस दिन साहिबा और जुल्फिकार की पहली बार लड़ाई हुई और फिर साहिबा ने गुस्से में अपना समान पॅक किया और अपना घर छोड़ कर बनारस अपने माता पिता के पास चली आई. साहिबा और जुल्फिकार की नाराज़गी को एक महीने से ज़्यादा गुज़र गया और इस दौरान साहिबा अपने अम्मी अब्बू के घर में ही रही.
इस दौरान फॅमिली के बड़े बुजुर्गों ने साहिबा और जुल्फिकार को समझा बुझा कर उन दोनो की आपस में सुलह करवा दी और यूँ साहिबा को चार-ओ-नचार वापिस जुल्फिकार के पास आना ही पड़ा. अभी साहिबा को दुबारा अपने शोहर के पास वापिस आए हुए चार महीने गुज़र चुके थे.
वैसे तो साहिबा ने घर के बुजुर्गों के कहने पर अपने शोहर से सुलह तो कर ली थी. मगर साहिबा को अब अपने शोहर से वो पहले वाला लगाव और प्यार नही रहा था. जुल्फिकार अब भी उसे हफ्ते में एक दो बार चोदता था. मगर साहिबा चूँकि अभी तक नोकरानि वाली वाकिये को भुला नही पा रही थी.
इसलिए उसे अब जुल्फिकार के साथ चुदाई का वो पहले जैसा मज़ा नही आता था. लेकिन अब कुछ भी हो उसे एक फर-मा-बर्दार बीवी बन कर अपनी जिंदगी तो गुज़ारना थी. इसलिए वो इस वकिये को भुलाने के लिए चुप चाप अपनी लाइफ में बिजी हो गई.
हॉस्पिटल में काम के दौरान साहिबा ये बात अच्छी तरह जानती थी. कि उस के कुछ मेल साथी डॉक्टर्स हॉस्पिटल की नर्सों को ड्यूटी के दौरान चोदते हैं. बनारस में अपनी हाउस जॉब और फिर रामपुर में शादी के बाद भी उस के कुछ साथी डॉक्टर्स ने साहिबा के साथ जिन्सी ताल्लुक़ात कायम करने की कोशिश की थी. मगर हर दफ़ा साहिबा ने उन की ये ऑफर ठुकरा दी.
अब जब से साहिबा ने अपने शोहर को रंगे हाथों अपनी नौकरानी को चोदते हुए पकड़ा था. तब से साहिबा के दिल ही दिल में एक बग़ावत जनम लेने लगी थी. अब नज़ाने क्यों उस का दिल चाह रहा था. कि जिस तरह उस के शोहर ने शादी के बाद भी दूसरी औरतों से नाजायज़ ताल्लुक़ात रख कर साहिबा के प्यार की तोहीन की है.
इसी तरह क्यों ना साहिबा भी किसी और मर्द से चुदवा कर अपने शोहर से एक किस्म का इंतिक़ाम ले. साहिबा के दिल में इस तरहके बागी याना ख़यालात जनम तो लेने लगे थे. लेकिन सौ बार सोचने के बावजूद साहिबा जैसी शरीफ लड़की में इस किस्म के ख़यालात को अमली-जामा पहना ने की कभी हिम्मत नही पड़ी थी.
फिर साहिबा की जिंदगी में अंजाने और हादसती तौर पर एक ऐसा वाकीया हुआ जिस ने साहिबा की जिंदगी में सब कुछ बदल कर रख दिया. साहिबा का ससुराली गाँव रामपुर से तक़रीबन एक घंटे की दूरी पर है. साहिबा के शोहर और ससुराल वाले गाँव में रहने के बावजूद खुले ज़हन के लोग हैं और वो आम लोगो की तरह अपने घर की औरतों पर किसी किस्म की सख्ती नही करते.
इसलिए साहिबा खुद ही अपनी कार ड्राइव कर के रोज़ाना अपने गाँव से शहर अपनी जॉब पर आती जाती थी. जिस पर उस के शोहर और ससुराल वालो को किसी किसम का कोई ऐतराज नही था. साहिबा की ड्यूटी ज़्यादा तर सुबह के टाइम ही होती. और वो अक्सर शाम का अंधेरा होने से पहले पहले अपने गाँव वापिस चली आती.
ये सिलसला कुछ दिन तो ठीक चलता रहा. मगर फिर कुछ टाइम बाद साहिबा के हॉस्पिटल के दो डॉक्टर्स का एक ही साथ दूसरे शहरो में तबादला हो गया. जिस की वजह से हॉस्पिटल में काम का बोझ बढ़ गया और अब साहिबा को जॉब से फारिग होते होते रात को काफ़ी देर होने लगी.
चूँकि साहिबा के गाँव का रास्ता रात के वक़्त महफूज नही था. जिस की वजह से साहिबा के शोहर जुल्फिकार साहिबा का रात के वक़्त अकेले घर वापिस आना पसंद नही करते थे. इसलिए जब कभी भी साहिबा लेट होती तो वो अपने शोहर को फोन कर के बता देती.
तो फिर या तो साहिबा के शोहर खुद साहिबा को लेने हॉस्पिटल पहुँच जाते. या फिर गाँव से अपने ड्राइवर को साहिबा को लेने के लिए भेज देते. इसी दौरान साहिबा के छोटे भाई आज़म ने भी अपनी एमबीबीएस की स्टडी मुकम्मल कर ली तो उस की हाउस जॉब भी रामपुर में साहिबा के ही हॉस्पिटल में स्टार्ट हो गई.
साहिबा ने अपने भाई आज़म को अपने घर में आ कर रहने की दावत दी. मगर आज़म ना माना और उस ने हॉस्पिटल के पास ही एक छोटा सा फ्लॅट किराए पे लिए लिया. उस फ्लॅट में एक बेड रूम वित अटेच्ड बाथरूम था.जिस के साथ एक छोटा सा किचन और लिविंग रूम था. जो कि आज़म की ज़रूरत के हिसाब से काफ़ी था.
अब आज़म के अपनी बहन साहिबा के हॉस्पिटल में जॉब करने की वजह से साहिबा को एक सहूलियत ये हो गई. कि जब कभी एमर्जेन्सी की वजह से साहिबा को रात के वक़्त देर हो जाती.या साहिबा का शोहर या ड्राइवर रात को किसी वजह से उसे लेने ना आ पाते तो साहिबा गाँव अकेले जाने की बजाय वो रात अपने छोटे भाई आज़म के पास उस के फ्लॅट में ही रुक जाती.
स्टार्ट में आज़म की ड्यूटी रात में होती और साहिबा दिन में ड्यूटी करती थी. इसलिए जब कभी भी साहिबा आज़म के फ्लॅट पर रुकती तो एक वक़्त में उन दोनो बहन भाई में से कोई एक ही फ्लॅट पर होता था. फिर कुछ टाइम गुज़रने के बाद आज़म की ड्यूटी भी चेंज हो कर सुबह की ही हो गई.
आज़म की ड्यूटी का टाइम चेंज होने से अब मसला ये हो गया कि जब साहिबा एक आध दफ़ा लेट ऑफ होने की वजह से आज़म के पास रुकी तो फ्लॅट में एक ही बेड होने की वजह से आज़म को कमरे के फर्श पर बिस्तर लगा कर सोना पड़ा.
एक बहन होने के नाते साहिबा ये बात बखूबी जानती थी कि आज़म को बचपन ही से फर्श पर बिस्तर लगा कर सोने से नींद नही आती थी. आज़म ने एक आध दफ़ा तो जैसे तैसे कर के फर्श पर बिस्तर लगा कर रात गुज़ार ही ली.
फिर कुछ दिनो बाद आज़म ने साहिबा को बताए बगैर एक और बेड खरीदा और उस को ला कर अपने बेड रूम में रख दिया. चूं कि साहिबा तो कभी कभार ही आज़म के फ्लॅट पर रुकती थी. इसलिए जब आज़म ने अपनी बहन से दूसरा बेड खरीदने का ज़िक्र किया तो साहिबा को उस का दूसरा बेड खरीदने वाली हरकत ना जाने क्यों एक फज़ूल खर्ची लगी.
जिस पर साहिबा आज़म से थोड़ा नाराज़ भी हुई. फिर दूसरे दिन साहिबा ने अपने भाई के फ्लॅट में जा कर बेड रूम में रखे हुए बेड का मुआयना किया तो पता चला कि चूँकि बेड रूम का साइज़ पहले ही थोड़ा छोटा था. इसलिए जब कमरे में दूसरा बेड रख गया तो रूम में जगह कम पड़ गई. जिस की वजह से कमरे में रखे हुए दोनो बेड एक दूसरे के साथ मिल से गये थे.
साहिबा “आज़म ये क्या तुम ने तो बेड्स को आपस में बिल्कुल ही जोड़ दिया है बीच में थोड़ा फासला तो रखते.”
आज़म: “में क्या करता कमरे में जगह ही बहुत कम है बाजी”
“चलो गुज़ारा हो जाए गा, मैने कौन सा इधर रोज सोना होता है” कहती हुई साहिबा कमरे से बाहर चली आई.
वैसे तो हर रोज साहिबा की पूरी कोशिस यही होती कि वो रात को हर हाल में अपने घर ज़रूर पहुँच जाय .मगर कभी कबार ऐसा मुमकिन नही होता था. इस के बाद फिर जब कभी साहिबा अपने भाई के पास रात को रुकती. तो वो दोनो बहन भाई रात देर तक बैठ कर अपने घर वालो और अपने रिश्तेदारों के बारे में बातें करते रहते.
इस तरह साहिबा का अपने भाई के साथ टाइम बहुत अच्छा गुज़र जाता था. ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे. कहते हैं ना कि वक़्त सब से बड़ा मरहम होता है. इसलिए हर गुज़रते दिन के साथ साथ साहिबा का रवईया आहिस्ता आहिस्ता अपने शोहर से दुबारा थोड़ा बहतर होने लगा था.
उन दिनो गन्नों की बुआई का सीज़न चल रहा था. जिस वजह से जुल्फिकार दिन रात अपने खेतों में बिजी रहते थे. इसलिए पिछले दो हफ्तों से वो और साहिबा आपस में चुदाई नही पाए थे. लेकिन आज सुबह जब साहिबा गाड़ी में बैठ कर हॉस्पिटल के लिए निकल रही थी. तो जुल्फिकार उस के पास आ कर कहने लगा कि काम ख़तम हो गया है और अब में फ्री हूँ. फिर उस ने आँख दबा कर साहिबा को इशारा किया “आज रात को” और खुद ही हंस पड़ा.
साहिबा ने जुल्फिकार की बात का कोई जवाब नही दिया और खामोशी से अपनी गाड़ी चला दी. बेशक साहिबा जुल्फिकार के सामने खामोश रही थी. मगर हॉस्पिटल की तरफ गाड़ी दौड़ाते हुए साहिबा ने बेखयाली में जब अपनी चूत पर खारिश की. तो उसे अपनी टाँगों के बीच अपनी चूत बहुत गीली महसूस हुई.
साहिबा समझ गई कि अंदर ही अंदर आज काफ़ी टाइम बाद उस की फुद्दी को खुद ब खुद लंड की तलब हो रही थी. उस रोज ना चाहते हुए भी बे इकतियार साहिबा सारा दिन बार बार अपनी घड़ी को देखती रही कि कब दिन ख़तम हो और कब वो घर जाय और अपने शोहर का लंड अपनी फुद्दी में डलवाए.
आज उस के दिल में एक अजीब सी एग्ज़ाइट्मेंट थी. और उस दिन दोपहर के बाद दो मेजर सर्जरी भी थीं सो काम भी बहुत था. खैर दूसरी सर्जरी के दौरान साहिबा को उम्मीद से ज़यादा टाइम लग गया और वो बुरी तरह थक भी गई थी. दो घंटे और थे और फिर वो होती और उस का शोहर और पूरी रात…
रात को अचानक साहिबा की आँख खुली. उस का बदन कमरे में गर्मी की शिद्दत से पसीना पसीना हो रहा था. साहिबा को अहसास हुआ कि उस की कमीज़ उतरी हुई है और वो सिर्फ़ ब्रा और शलवार में अपने बेड पर लेटी हुई है.
गर्मी की शिद्दत की वजह से ना जाने कब और कैसे साहिबा ने अपनी कमीज़ उतार दी इस का उसे खुद भी पता नही चला. साहिबा अभी भी नींद की खुमारी में थी और इस खुमारी में साहिबा ने महसूस किया उस के हाथ में उस के शोहर का लंड था.
जिसे वो खूब सहला रही थी. और शलवार में मौजूद उस के शोहर का लंड साहिबा के हाथों में झटके मार रहा था. इतने में रुबीना का दूसरा हाथ जुल्फिकार के पेट से हल्का सा टच हुआ तो साहिबा को अंदाज़ा हुआ कि उस की तरह उस के शोहर की कमीज़ भी उतरी हुई है.
साहिबा अपने शोहर के लंड को अपने काबू में पा कर मुस्कराने लगी मगर सोते हुए भी उसने लंड को नही छोड़ा. कमरे में अंधेरा था. जिस की वजह से कोई भी चीज़ दिखाई नही दे रही थी. मगर साहिबा को कमरे में गूँजती हुई अपने हज़्बेंड की तेज तेज़ सांसो से पता चल रहा था कि वो भी जाग रहे हैं.
साहिबा ने अपने शोहर के लंड पर नीचे से उपर तक हाथ फेरा तो उस के शोहर के मुँह से एक ज़ोरदार सी “सस्स्स्स्स्स्सस्स” सिसकारी निकली गई. सिसकारी की आवाज़ से लगता था आज साहिबा का शोहर कुछ ज़यादा ही गरम हो रहा था.
साहिबा को भी अपने हाथ में थामा हुआ अपने शोहर का लंड आज कुछ ज़यादा ही लंबा, मोटा और सख़्त लग रहा था. खास कर लंड की मोटाई से तो आज ऐसे महसूस हो रहा था कि लंड जैसे फूल कर डबल हो गया हो. साहिबा को पूरे दिन की सख़्त मेहनत का अब फल मिल रहा था.
वो आज पूरा दिन हॉस्पिटल में बहुत ही बिजी रही थी. और फिर शाम को दूसरी सर्जरी में कॉंप्लिकेशन्स की वजह से साहिबा को हॉस्पिटल में काफ़ी देर हो गई थी और साहिबा को ऐसे लग रहा था कि वो आज रात अपने घर नही जा पाएगी… इतनी रात…. इतनी रात…..
अचानक साहिबा के दिमाग़ ने झटका खाया और वो नीद से पूरी तरह जाग गई. उफ्फ रात को तो में बहुत लेट हो गयी थी और फिर मेने घर फोन किया था कि में घर नही आ पाऊँगी… फिर में अपने भाई के फ्लॅट पर…. सोते सोते ये सोच कर ही अचानक साहिबा के पूरे जिस्म में एक झुरझरी सी दौड़ गई….
“में अपने शोहर के साथ नही…. बल्कि मे अपने सगे भाई….. नही नही नही….. नही…………” सर्दी की ठंडी रात में भी साहिबा का बदन पसीने से तरबतर हो गया.
“ये हुआ कैसे” साहिबा सोच रही थी.
जब वो आज़म के फ्लॅट में आई थी तो उस का भाई सोया हुया था. फ्लॅट की एक चाभी साहिबा पास भी थी. साहिबा ने दरवाज़ा खोला और कपड़े चेंज किए बिना ही लेट गई और लेटते ही उसे नींद आ गई. फ्लॅट में आते वक़्त साहिबा इतना थकि हुई थी. जिस की वजह से उसे डर था कि नींद के मारे वो कहीं रास्ते में ही ना गिर जाए.
तो फिर क्या रात में भाई ने. “नही, एसा नही हो सकता… मेरा भाई एसा नही है! तो फिर कैसे?”
साहिबा सोच रही थी… “कैसे मेरे हाथ में अपने भाई का लंड आ गया … अगर उसने कोई ग़लत हरकत नही की.”
साहिबा ने जब आँखे खोल कर गौर से देखा तो उसे अंदाज़ा हुआ कि रात को नींद की वजह से वो करवटें बदलते बदलते ना जाने किस तरह अपने भाई के बेड पर चली आई है. हालाँकि दोनो बेड पूरे जुड़े हुए नही थे. लेकिन वो इतने करीब थे कि नींद में करवटें बदलते हुए इंसान एक बेड से दूसरे बेड पर ब आसानी जा सकता था.
“तो इसका मतलब में ही… अपने भाई के बेड पर…. उसका लंड हाथ में लेकर ….उफफफफफफफफ्फ़ नही…वो क्या सोचता होगा मेरे बारे में?…. साहिबा अपनी नींद के खुमार में अपने आप से ही बातें किए जा रही थी.
साहिबा ने अपने भाई की तरफ से कोई हलचल महसूस नही की. लगता था शायद आज़म को अंदाज़ा हो गया था कि उस की बहन साहिबा अब शायद जाग गयी है और ये जो कुछ उन के बीच हुआ वो सब नींद में होने की वजह से हो गया था. दोनो बहन भाई के बीच में मुश्किल से दो फीट का फासला होगा और वो दोनो चुप चाप लेटे हुए थे.
साहिबा की समझ में कुछ नही आ रहा था कि वो क्या करे. वो ये सोच कर शर्म से पानी पानी हो रही कि उस का भाई उस के बारे में क्या सोचेगा. कमरे में बिल्कुल सन्नाटा था. रह रह का साहिबा अपने दिल-ओ-दिमाग़ में अपने आप को मालमत कर रही थी.
”ये तूने क्या कर दिया? अब आज़म क्या सोचता होगा? मेरी बड़ी बहन एसी है… अपने भाई के लंड को…?
साहिबा अभी इन ही सोचो में गुम थी कि उसे एक और झटका लगा. साहिबा ने अभी भी अपने भाई का लंड पकड़ा हुआ था. जब कि उसे नींद से जागे हुए कोई पंद्रह मिनिट हो गये थे. साहिबा ने सोचा कि वो जल्दी से अपना हाथ आज़म के लंड से हटा ले मगर उस वक़्त सूरतेहाल एसी थी कि वो चाहते हुए भी एसा भी न कर सकी. साहिबा डर रही थी कि अगर वो कोई हरकत करती है तो उस का भाई कुछ बोल ना पड़े.
“क्या करूँ” साहिबा ये सोच रही थी मगर उस की समझ में कुछ नही आ रहा था. ऐसे ही पड़े पड़े कोई एक आध मिनिट और गुज़र गया और साहिबा का हाथ अभी तक आज़म के लंड पर था. आज़म का लंड अब कुछ ढीला हो गया था मगर फिर भी साहिबा को अपने भाई आज़म का लंड साइज़ में काफ़ी बड़ा महसूस हो रहा था.
आधी रात को अंधेरे कमरे में बेड पर साथ साथ सीधे लेटे दोनो बहन भाई जाग तो रहे थे. मगर उन दोनो में कोई नही जानता था कि वो अब करें तो क्या करें.
“जुल्फिकार के लंड के मुक़ाबले में आज़म का लंड काफ़ी लंबा मोटा है” उफफफ्फ़ में भी क्या सोच रही हूँ अपने ही भाई के लंड के बारे में…. साहिबा ने अपने आप को कोसा. मगर सच में है तो बहुत बड़ा…. उफ्फ पूरा खड़ा हो कर तो…… मुझे एसा नही सोचना चाहिए साहिबा ने अपने आप को फिर डांता.
“भाई तो तस्सली करा देता होगा सच में…. हाईए कितना लंबा है मोटा तो बाप रेरर….किसी कंवारी लड़की की तो….” सोचते सोचते कब साहिबा ने अपना हाथ आज़म के लंड के गिर्द कस दिया, उसे पता ही ना चला. साहिबा के हाथ ने जैसे ही आज़म के लंड को कसा तो आज़म के मुँह से सिसकारी फुट पड़ी. और उस के सोते हुए लंड ने फिर झटका खाया और फिर से एक दाम खड़ा होने लगा.
आज़म की सिसकी को सुन कर साहिबा एक दम हडबडा कर अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर निकल आई और उस ने फॉरन अपने भाई के लंड को अपने हाथ से छोड़ दिया. मगर जब एक जवान कुँवारा मर्द हो और साथ मे एक खूबसूरत जवान शादी शुदा औरत जो उस की सग़ी बहन हो.
और वो औरत जब रात की तन्हाई में एक ही बिस्तर पर आधी नंगी लेटी हुई उस जवान मर्द के लंड को सहला रही हो. तो एक भाई होने के बावजूद आज़म अपने आप को कैसे काबू में कैसे रखता. इसलिए जब आज़म ने अपने लंड को अपनी बहन के हाथ से निकलता हुआ महसूस किया तो उस ने फॉरन ही साहिबा की तरफ करवट बदली.
आज़म ने साहिबा को पकड़ कर अपनी तरफ कैंचा और फिर अपनी बहन के हाथ को पकड़ कर उसे दुबारा अपने लंड पर रख दिया. साथ ही आज़म का लेफ्ट हॅंड सरकता हुआ साहिबा की टाँगो के बीच आया और उस ने अपना हाथ पहली बार अपनी बहन की शादी शुदा चूत पर रख दिया.
आज़म का हाथ फुद्दी पर लगते ही साहिबा का बदन अकड सा गया. साहिबा ने आज़म को रोकने के लिए थोड़ी मज़ामत करते हुए आज़म के हाथ को अपनी चूत से हटाने की कोशिश की. मगर वो उसे रोक नही पाई और आज़म का हाथ बेताबी से अपनी बहन की फूली हुई चूत पर फिसलता रहा.
साहिबा पिछले दो हफ्तों से अपने शोहर जुल्फिकार से नही चुदि थी इसलिए आज साहिबा के बदन मे आग लगी हुई थी. और उस की फुद्दि से पानी बहने लगा था. साहिबा की फुद्दि लंड माँग रही थी और लंड साहिबा के हाथ मे था..
उस के अपने सगे छोटे भाई का लंबा चौड़ा लंड. जवानी की गर्मी और सेक्स की हवस ने उन दोनो बहन भाई की सोचने और समझने की सालिहात जैसी ख़तम कर दी थी और शरम का परदा गिरना सुरू हो गया था. आज़म के हाथ उस की बहन की पानी छोड़ती हुई फुद्दी से खेलने में मसरूफ़ रहे. जिन के असर से साहिबा का बदन अब ढीला पड़ने लगा.
जब आज़म ने महसूस किया कि उस की बहन थोड़ी ढीली पड़ गई है तो उस का होसला भी बढ़ गया. और उस का हाथ अपनी बहन की फुद्दी को छोड़ कर उस के मम्मे पर आया और ब्रा के उपर से अपनी बहन के जवान तने हुए मम्मो पर हाथ फेरने लगा.
उधर आज़म के बहकते हाथों ने साहिबा की फुद्दी में भी हलचल मचा दी थी. इसलिए उस को भी अब अपने आप पर कंट्रोल नही रहा और फिर साहिबा का हाथ भी खुद ब खुद तेज़ तेज़ उस के अपने भाई के लंड पर दुबारा चलने लगा. उपर से नीचे तक साहिबा अपने भाई के लंड को मुट्ठी में भर कर निचोड़ रही थी.
अब आज़म ने अपने हाथ से साहिबा के मम्मे को मसलने शुरू कर दिए, जितना ज़ोर से वो साहिबा के मम्मे को मसलता उतने ही ज़ोर से उस की बहन साहिबा उस के लंड को पकड़ कर खींचती और दबाती. ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरे कमरे में दोनो बहन भाई आपस में कोई मुकाबला कर रहे हों. पूरे कमरे में दोनो की आहें, कराहें और सिसकियाँ गूँज रही थीं.
आज़म ने साहिबा को थोड़ा सा उठाया और उस ने अपने हाथ साहिबा की कमर पर ले जा कर अपनी बहन के ब्रा की हुक खोल दी. बहन के ब्रा की हुक खोलते ही एक बेसबरे बच्चे की तरह आज़म ने ब्रा को खींच कर निकाला और अपनी बहन के बदन से दूर फेंक दिया. अब साहिबा अपने भाई के सामने कमर से उपर पूरी नंगी थी.
हालाँकि कमरे में बहुत अंधेरा था लेकिन साहिबा अपने भाई की नज़रें अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी. आज़म ने अपना मुँह नीचे झुकाया और अपनी बहन के राइट मम्मे को जीभ से चाटने लगा. भाई का मुँह अपने मम्मे पर लगते ही साहिबा तो जैसे सिहर उठी. उस ने अपने भाई का सिर पकड़ कर अपने मम्मे पर दबाया तो आज़म ने मुँह खोला और अपनी बहन के तने हुए निपल को मुँह लगा कर चूसने लग गया.
अगले भाग में आगे की कहानी जारी रहेगी!... आप सभी के मेल का स्वागत है।
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