शौहर से बदला लेने के लिए भाई जान से चुदी -2
By साहिबा Published on पढ़े जाने की संख्या: 907
अब तक आपने पढ़ा... शौहर से बदला लेने के लिए भाई जान से चुदी -1
आज़म ने अपना मुँह नीचे झुकाया और अपनी बहन के राइट मम्मे को जीभ से चाटने लगा. भाई का मुँह अपने मम्मे पर लगते ही साहिबा तो जैसे सिहर उठी. उस ने अपने भाई का सिर पकड़ कर अपने मम्मे पर दबाया तो आज़म ने मुँह खोला और अपनी बहन के तने हुए निपल को मुँह लगा कर चूसने लग गया.
अब आगे...
“आज़म… आज़म ए तू की कर दित्ता है.. शीयी” साहिबा फरहत-ए-जज़्बात में पंजाबी ज़ुबान में चिल्ला उठी.
मगर आज़म ने अपनी बहन की बात का कोई जवाब नही दिया और ज़ोर ज़ोर से साहिबा के निपल को काटते हुए उसे चूस्ता रहा, बीच बीच में उसे बदल कर दूसरे मम्मे को चूसने लग जाता. आज़म एक मम्मा चूस्ता तो दूसरा मसलता. साहिबा अपने भाई का वलिहाना प्यार महसूस कर के मज़े के मारे पागल हो रही थी..
पंद्रह मिनिट मम्मे चूस्ते हो गयी थे और साहिबा अब बेसूध होती जा रही थी. तभी साहिबा ने अपने भाई का हाथ अपनी सलवार के नाडे पर महसूस किया. आज़म ने साहिबा का मम्मा मुँह से निकाला और फिर अपनी बहन की शलवार का नाडा पकड़ कर एक ही झटके में खोल दिया.
चुदाई की हवस में डूबी हुई साहिबा ने भी बिना सोचे समझे अपनी कमर उठा कर अपने आप को पूरा नगा करने में अपने ही भाई की मदद की. अगले ही पल साहिबा ने अपने भाई की उंगलियाँ अपनी पैंटी के एलस्टिक में महसूस की और फिर दूसरे झटके में साहिबा की पैंटी भी उस के बदन से अलहदा हो गयी .
अब साहिबा पूरी से नंगी थी. आज से पहले वो ये कभी सोच भी नही सकती थी कि उस का अपना भाई उसे कभी इस तरह ना सिर्फ़ नंगी करे गा बल्कि वो खुद उस के हाथों नंगी होने में उस की मदद करेगी. लेकिन वो सब कुछ जो सोचा नही था हो रहा था और तेज़ी से हो रहा था.
अपनी बहन को मुकम्मल नंगा करने के बाद आज़म ने भी अपनी शलवार उतार कर नीचे फैंक दी. साहिबा बिस्तर पर अपनी टांगे फैलाए पड़ी थी. खुद को नंगा करते ही एक भी लम्हा ज़ाया किए बैगर आज़म फॉरन अपनी बहन साहिबा की खुली टाँगों के बीच आया और अपना लंड अपनी बहन की चूत के मुँह पर टिका दिया.
अपने भाई के मोटे ताज़े और जवान लंड का अपनी गरम प्यासी चूत के साथ टकराव महसूस करते ही साहिबा की चूत जो पहले ही बूरी तरह से गीली थी, वो कांप सी गयी. साहिबा ने बे इकतियार अपनी बाँहे अपने भाई की कमर के गिर्द लपेट दीं.
साहिबा से अब इंतज़ार नही हो रहा था. वो चाहती थी कि अब उस का भाई अपना लंड उस की चूत के अंदर डाल कर उसे बस चोद ही डाले. आज़म अपना लंड अपनी बहन की फुद्दी में डालने की बजाय फुद्दी के होंठो पर के उपर ही अपना लंड रगड़ने लगा.
शायद वो अपनी बहन की फुद्दी की प्यास और बढ़ाने के लिए जान बुझ कर एसा कर रहा था. साहिबा के लिए वाकई ही ये बात अब नकाबिले बर्दास्त होने लगी थी और वो हवस के तूफान में अंधी हो कर अपने भाई पर बरस पड़ी.
“ये क्या कर रहा है. अंदर डाल…अंदर डाल जल्दी से…ही…अब बर्दाश्त नही होता! जल्दी कर!”
आज़म ने जब अपनी बहन के मुँह से ये इल्फ़ाज़ सुने तो एक पल के लिए वो अंधेरे में ही साहिबा का मुँह तकने लगा. शायद उसे यकीन नही हो पा रहा था कि उसकी बहन जिसे वो बचपन से जानता है एसा भी बोल सकती है.
लेकिन साहिबा अपने होशो हवास गँवा चुकी थी. और अब बिस्तर पर आज़म के सामने एक बहन नही बल्कि एक प्यासी औरत पड़ी थी. जिस के बदन की आग आज बहुत उँचाई पर पहुँच चुकी थी. और ये आग अब उस वक़्त सिर्फ़ आज़म के लंड से ही बुझ सकती थी.
“भाईईईईईईई क्या सोच रहे हो.. इसे जल्दी से अंदर डाल… वरना में पागल हो जाऊंगी” साहिबा लगभग चिल्ला उठी थी.
अपनी बहन के चिल्लाने पर आज़म जैसे नींद से जाग उठा. उस ने जल्दी से लंड अपनी बहन की फुद्दि के मुँह पर टिकाया और साहिबा की पतली कमर को अपने हाथों से मज़बूती से थाम लिया. साहिबा ने मदहोशी में अपनी आँखे बंद कर ली, और उस लम्हे के लिए खुद को तैयार कर लिया जिस का उसे अब बेसबरी से इंतज़ार था.
आज़म ने दबाव बढ़ाया और उस का मोटा लंड उस की बहन फुद्दी के लिप्स को फैलाता हुआ फुद्दी के अंदर जाने लगा. पिछले तकरीबन एक साल से साहिबा अपनी शोहर से खूब चुदि थी मगर अपने भाई के मोटे लंड का एहसास ही कुछ और था.
शादी शुदा होने के बावजूद साहिबा की फुद्दि काफ़ी टाइट थी और आज़म के लंड की मोटाई ज़्यादा होने की वजह से आज़म को अपना लंड बहन की चूत में डालते वक़्त खूब ज़ोर लगाना पड़ रहा था. साहिबा को अपने भाई के मोटे लंड को अपनी चूत के अंदर लेते वक़्त हल्की हल्की तकलीफ़ तो हो रही थी.
लेकिन जोश में होने की वजह से उसे अब किसी भी तकलीफ़ की परवाह नही थी. बल्कि उसे तो इस तकलीफ़ में भी एक मज़ा आ रहा था. साहिबा ने अपने भाई के कंधे थाम लिए और अपनी कमर पूरे ज़ोर से उपर उठाते हुए भाई की मदद करने लगी. लंड की टोपी अंदर घुसा कर आज़म रुका फिर उसने साहिबा की कमर पर अपने हाथ कस लिए और एक करारा धक्का मारा.
“हाए…हाए…. आज़म….मार दित्ता तू मेनू…उफ़फ्फ़…बहुत मोटा है तेरा” साहिबा ने फिर मज़े से कराहते हुए कहा.
आज़म के उस एक धक्के में उस का आधा लंड उस की बहन की फुद्दी में पहुँच चुका था. आज़म ने लंड बाहर निकाला और फिर एक ज़ोरदार धक्का मारा. इस बार लंड और अंदर तक चला गया, इसी तरह वो पूरा लंड एकदम से अंदर डाल कर आहिस्ता आहिस्ता अपनी बहन को चोदने लगा.
कुछ ही मिनिट्स में आज़म का लंड साहिबा की फुद्दि की जड़ तक पहुँच चुका था. साहिबा ने अपनी टांगे अपने भाई की कमर के गिर्द लपेट दी. साहिबा के मुख से फूटने वाली हल्की कराहे उस के भाई का हॉंसला बढ़ा रही थीं और वो हर धक्के पर अपनी पूरी ताक़त लगा रहा था. और साहिबा… मज़े की इस हालत में पहुँच चुकी थी. कि इस हालत को लफ़ज़ो में बयान करना उस के लिए ना मुमकिन था.
“आराम से आज़म…. इतना भी ज़ोर मत लगा कि मेरी कमर टूट जाए….. तेरे पास ही हूँ जितना चाहे तू मुझे……”
“क्या करूँ बाजी… उफ्फ तुम्हारी इतनी टाइट है….. कंट्रोल नही…. होता………. एसा मज़ा जिंदगी में पहले कभी नही आया.”
“नही रे तेरा ही इन्ना मोटा है के….. देख तो कैसे फँसा हुया है…. उफ्फ कैसे रगड्र रहा है मेरी फू….”
साहिबा के मुँह से फुद्दि का लफ़्ज निकलते निकलते रह गया. साहिबा ने कभी भी अपने शोहर के साथ सेक्स करते हुए ऐसी ज़ुबान का इस्तेमाल नही किया था. मगर आज अपने भाई के साथ इतनी गर्म जोशी से सेक्स करते वक़्त साहिबा शरम-ओ-हेया की सभी हदें पार कर जाना चाहती थी.
फुद्दि और लंड की जंग जारी थी. फुद्दि में लगा तार पड़ रहे ज़ोरदार धक्कों से ज़ाहिर हो रहा था. कि आज़म को अपनी बहन की फुद्दी चोदने में कितना मज़ा आ रहा था. वो हर धक्के में लंड साहिबा की फुद्दि की जड़ तक डाल देता.
उस का लंड साहिबा की बच्चे दानी पर ठोकर मार रहा था. हर धक्के के साथ उसके टटटे साहिबा फुददी के नीचे ज़ोर से टकराते. साहिबा भी अपने भाई की ताल से ताल मिलाते हुए अपनी कमर उछालती हुई अपनी फुद्दि अपने भाई के लंड पर पटकने लगी.
साहिबा ने आज़म के कंधे मज़बूती से थाम लिए और अपनी टाँगे उसके चुतड़ों के गिर्द कस दी और अपने भाई के हर धक्के का जवाब भी उतने ही जोश से देने लगी जितने जोश से वो अपनी बहन को चोद रहा था. हर धक्के के साथ साहिबा के मुख से सिसकारियाँ फुट रही थी. दोनो बहन भाई के जिस्मों के टकराने और लंड की गीली फुद्दि में हो रही आवाज़ाही से पूरे कमरे में आवाज़ें गूँज़ रही थी.
“और ज़ोर लगा आज़म! और ज़ोर से! हाए एसा मज़ा पहले कभी नही आया! और ज़ोर लगा कर डालो मेरी चूत में भाई.”
साहिबा के मुँह से निकलने वाले अल्फ़ाज़ ने आग में घी का काम किया. आज़म एक बेकाबू सांड़ की तरह अपनी बहन साहिबा को चोदने लगा. सॉफ ज़ाहिर था कि उसे अपनी बहन के मुँह से निकले उन गरम अल्फाज़ो को सुन कर कितना मज़ा आया था. और उसके जोश में कितना इज़ाफ़ा हो गया था. जिस की वजह से उस का हर धक्का उस की बहन की फुद्दि को फाड़ कर रख देने वाला था.
“सबाश भाई…चोद मुझे…और ज़ोर से धक्का मार…. पूरा अंदर तक डाल अपना लंड मेरी फुद्दि में.”
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आज साहिबा ने सब रिश्ते नाते भुला कर दुनियाँ की सब हदें पार कर लीं और इसका इनाम भी उसे खूब मिला. आज़म अपने दाँत पिसते हुए बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से अपनी बहन की फुद्दी चोदने लगा. साहिबा के जिस्म में जैसे करेंट दौड़ रहा था. फुद्दि के अंदर पड़ रही चोटों से मज़े की लहरें उठ कर पूरे बदन में फैल रही थी. जिस वजह से साहिबा अपना जिस्म अकड़ाने लगी. साहिबा अब जल्दी ही छूटने वाली थी.
“हाए! मार दित्ता मेनू!…. उफफफ्फ़ अपनी बहन को….. चोद रहा है या…. पिछले…. किसी जनम का… बदला ले रहा है.”
“नही मेरी बहना! …में तो… तुझे…. दिखा रहा हूँ असली…. चुदाई कैसे… होती है. कैसे एक मर्द……. औरत की तस्सली करता है.”
“हाए…. देखना कहीं….. तस्सल्ली करते करते….. मेरी फुद्दी ना फाड़ देना.”
साहिबा ने अपनी बाहें अपने भाई की गर्दन पर लपेट दीं और अपनी टाँगे भाई की कमर पर और भी ज़ोर से कस दीं. साहिबा की कमर अब हिलनी बंद हो चुकी थी. दोनो भाई बहन बुरी तरह से हांफ रहे थे. साहिबा को अपनी टाइट फुद्दि में अपने भाई का लंड फूलता हुआ महसूस हुआ, लगता था वो भी फारिग होने के करीब ही था.
“आज़म… में छूटने….. वाली हूँ… मेरे साथ साथ तू भी… हाई….हाई… उफफफ्फ़…. भाई…भाईईईईईईई!” और साहिबा की चूत फारिग होने लगी, फुद्दि से गाढ़ा रस निकल कर भाई के लंड को भिगोने लगा. साहिबा की फुद्दि बुरी तरह से खुलते और बंद होते हुए अपने भाई के लंड को कस रही थी.
आज़म ने पूरा लंड बाहर निकाल कर पूरे ज़ोर से अंदर पेला, ऐसे ही दो तीन ज़ोरदार धक्के मारने के बाद एक हुंकार भरते हुए साहिबा के उपर ढह पड़ा. आज़म के लंड से गाढ़ी मलाई निकल कर उस की बहन की चूत को भरने लगी. उन दोनो की हालत बहुत बुरी थी.
साहिबा को एक अंजानी ख़ुसी का अहसास अपने पूरे जिस्म में महसूस हो रहा था. उसे लग रहा था जैसे उस का जिस्म एकदम हल्का हो कर आसमान में उड़ रहा हो. वो पल कितने मजेदार थे, एसा सुख, एसा करार उस ने ज़िंदगी में पहली बार महसूस किया था.
आहिस्ता आहिस्ता साहिबा की फुद्दि ने फड़कना बंद कर दिया. उधर आज़म का लंड भी अब पूर सकून हो चुका था और आहिस्ता आहिस्ता उस का लंड भी सॉफ्ट होता जा रहा था. आज़म अभी तक अपनी बहन के उपर ही गिरा पड़ा था. और उस के जिस्म के बोझ तले साहिबा के लिए अब हिलना भी मुश्किल था.
थोड़ी देर बाद आज़म साहिबा के उपर से उठ कर उस के बराबर में लेट गया. जब दिमाग़ से चूत की गर्मी कम हुई तो तब साहिबा के होशो हवास वापिस लोटने लगे और अब साहिबा का सामना एक होलनाक हक़ीक़त से हो रहा था.
अब उसे ये एहसास हो रहा था कि उन दोनो भाई बहन ने कैसा गुनाह कर दिया है. साहिबा ने जब उन अल्फ़ाज़ को अपने दिल में दोहराया जो उस ने कुछ लम्हे पहले आज़म से सेक्स करते हुए उस को कहे थे तो साहिबा के पूरे बदन में झुरजूरी सी दौड़ गयी.
“में इतनी बेशर्म और बेहया कैसे बन गयी? मेरे मुँह से वो अल्फ़ाज़ कैसे निकल गये? कैसे में भूल गयी कि में अब शादी शुदा हूँ? में क्यों खुद को ये गुनाह करने से रोक नही पाई?”
साहिबा के दिल में अब ये तमाम सवाल उठ रहे थे. जिन का कोई भी जवाब उसे सूझ नही रहा था. सब से बड़ा सवाल तो ये था कि अब में अपने भाई आज़म का सामना कैसे करूँगी!
“वो मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा? कैसे में एक बाज़ारु औरत की तरह उस से पेश आ रही थी! मेरा काम तो अपने भाई को ग़लत रास्ते पर जाने से रोकना था मगर में तो खुद…… खुदा मुझे इस गुनाह के लिए कभी माफ़ नही करेगा” साहिबा दिल ही दिल में खुद को दुतकार रही थी.
उधर बिस्तर पर आज़म की तरफ से भी कोई हलचल नही हो रही थी. शायद उसे भी अपनी बहन साहिबा की सोच का अंदाज़ा हो गया था. जिस वजह से शायद उसको भी अफ़सोस हो रहा था और वो भी अपनी बहन की तरह अपने किए पर अब पछता रहा था.
साहिबा ऐसे ही सोचों में गुम बिस्तर पर पड़ी रही. कोई रास्ता कोई हल उसे नही सूझ रहा था. साहिबा जितना अपने किए हुए गुनाह के बारे में सोच रही थी उतना ही उसे खुद से नफ़रत हो रही थी. ऐसी ही सोचों में गुम काफ़ी वक़्त गुज़र गया.
कमरे में गूँजती आज़म की हल्की हल्की साँसों की आवाज़ से लग रहा था कि वो सो गया है. लेकिन साहिबा की आँखों में तो नींद का नामोनिशान तक ना था. आख़िर कर साहिबा उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गयी. ये सोचते हुए कि शायद नहा कर बदन को कुछ राहत मिले. या नहाने से शायद उस गुनाह की गंदगी उस के बदन से थोड़ी बहुत उतर जाए.
जिस से साहिबा का जिस्म अब भरा पड़ा था. साहिबा इन ही ख़यालों में डूबी हुई बाथरूम में गयी और दरवाज़ा बंद कर के बाथरूम का बल्ब ऑन किर दिया. साहिबा ने जब बाथरूम के आयने में अपनी शकल देखी तो उसे खुद खुद पर ही रहम आने लगा.
साहिबा के पूरे बाल बिखरे हुए थे, होंठ थोड़े सूज गये थे, आँखे एकदम सुर्ख हो गयी थीं और उनमे उदासी सी झलक रही थी. साहिबा ने अपनी एसी हालत पहली बार देखी थी. वो बिना कपड़े पहने ही बाथरूम में चली आई थी.
वैसे भी कमरे में अंधेरा होने की वजह से कपड़े ढूँढने के लिए साहिबा को लाइट जलानी पड़ती. जो वो आज़म के जाग जाने के डर से नही करना चाहती थी. साहिबा की निगाहें आईने में अपने चेहरे से नीचे होते हुए अपने मम्मों पर टिक गयी.
उस के निपल अभी भी अकडे और खड़े हुए थे और वो एक दम सूज गये थे. आज़म के मसल्ने की वजह से साहिबा के मम्मे एकदम सुर्ख हो गये थे. साहिबा ने एक गहरी साँस ली और आयने के सामने से हटते हुए शवर की नीचे चली गयी.
शवर का मुँह खोलते ही साहिबा के बदन पर ठंडा पानी पड़ा तो उस ने फ़ौरन एक राहत की साँस ली. पानी के नीचे खड़े होते ही साहिबा के हाथ उस के जिस्म पर घूमने लगे. जिस्म पर घूमते हुए जैसे ही साहिबा का हाथ उस की फुद्दी पर गया तो उस का पूरा हाथ उस की फुद्दि के अंदर से बह कर बाहर आने वाले उस के अपनी चूत और उस के सगे भाई के लंड के रस से भीग गया.
साहिबा जल्दी जल्दी हाथ चलाते हुए अपनी फुद्दी सॉफ करने लगी. जैसे वो अपने किए हुए गुनाह का सबूत मिटा देना चाहती हो. मगर उस गुनाह की छाप तो साहिबा के तन बदन पर पड़ चुकी थी. अब वो अपने आप को जितना भी सॉफ करती मगर रस था कि निकलता ही जा रहा था.
हार कर साहिबा ने शवर का पाइप निकाला और उसे एक हाथ से पकड़ कर अपनी फुद्दि के मुँह पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी फुद्दि के होंठों को फैलाया जिस से वो अंदर तक सॉफ हो जाए. थोड़ी देर बाद साहिबा ने शवर के पानी से बाथरूम में बने हुए टब को भरा और फिर वो टब में लेट गयी.
साहिबा का दिल अब हर गुज़रते पल के साथ अब कुछ पुरसकून होता जा रहा था. अंदर चल रहा तूफान अब ठंडा पड़ रहा था. साहिबा टब में लेटी लेटी ये सोचने लगी कि कल जब दिन के उजाले में अपने भाई का सामना करूँ गी तो खुद को कैसे संभालूंगी.
एक सवाल जो अब भी साहिबा के दिल में गूँज रहा था. जिससे वो पीछा नही छुड़ा पा रही थी वो ये था कि क्या आज़म भी उस की तरह ही अपने किए पर पछता रहा था. अगर उसके मन दिल में पछतावा नही हुआ और कहीं उसने दुबारा कोशिस की तो……. नही ये दुबारा नही हो सकता. में उसे कभी दुबारा खुद को छूने नही दूँगी.
“हालाकी पिछली बार ग़लती मेरी अपनी थी. इस काम का स्टार्ट जाने अंजाने में खुद मैने किया था. लेकिन वो सब एक ग़लती थी मगर फिर भी अगर आज़म ने सोचा कि मेने खुद जान बुझ कर उससे अपने नाजायज़ ताल्लुक़ात बनाए हैं और में फिर से उससे चुदवाना चाहती हूँ तो? यही सवाल था यो साहिबा को बार बार परेशान किए जा रहा था.
काफ़ी टाइम बाद साहिबा टब से बाहर निकली. अब वो काफ़ी हद तक सम्भल चुकी थी. वो अब पुरसकून थी या फिर ये आने वाले तूफान के पहले की खामोशी थी. साहिबा ने अपना बदन पोंच्छा .अब उस के पहनने के लिए कुछ भी नही था सिवाय बाथरूम में लटके हुए एक टॉवल के. मगर वो छोटा सा तोलिया भी साहिबा के बदन को ढकने के लिए नाकाफ़ी था.
साहिबा फिर से आयने के सामने खड़ी हो गयी और अपने बदन को आयने में दुबारा देखने लगी. साहिबा का दूध सा मखमली बदन बल्ब की रोशनी में दमक रहा था. साहिबा ने अपने बालों में उंगलियाँ फेरते हुए जब उन्हे झटका तो साहिबा के मोटे मोटे माममे उच्छल पड़े .
साहिबा को अपने मम्मों पर अभिमान था. बिल्कुल गोल मटोल उपर हल्के गुलाबी रंग का घेरा और उन पर गहरे गुलाबी रंग के निपल. साहिबा ने अपने दोनो हाथ अपने मम्मों पर रखे और उन्हे आहिस्ता आहिस्ता सहलाया. उफफफ्फ़ कैसे तने हुए जवान मम्मे थे उस के.
“कुछ भी हो एक बात तो है आज़म याद ज़रूर रखेगा इस रात को” चाहे उसकी बहन हूँ लेकिन मेरी जैसी उसे पूरी जिंदगी में दोबारा चोदने को कभी नही मिलेगी……उफ्फ ये में क्या सोच रही हूँ इतना कुछ हो जाने के बाद भी?” साहिबा खुद को दुतकारा.
मगर बात थी तो सच. दूध जैसा गोरा रंग, गोल मटोल मोटे मम्मे, पतली सी कमर और बाहर को निकली गोल गान्ड जिसे देख कर किसी की आँखों में हवस का नशा चढ़ सकता था. “आज़म की तो एक तरह से लॉटरी ही लग गयी थी वरना उसे तो सपने में भी मेरे जैसी चोदने को ना मिले” सोचते हुए साहिबा मुस्करा पड़ी.
इन ही ख़यालो में गुम साहिबा ने जब आहिस्ता आहिस्ता से अपने निप्प्लो को मसला तो उस के मुँह से कराह फुट पड़ी. कैसे मेरा सगा भाई इन्हे ज़ोर ज़ोर से मसल रहा था… और जब उसने इन्हे मुँह में लिया था…. उफ्फ मेरी तो जान ही निकल गयी थी……. लगता था बहुत दिनो से भूखा था और फिर जब इतने दिनो के भूखे को चावलों से भरी थाली मिल जाए तो वो तो टूट ही पड़ेगा…..
बेचारा आख़िर करता भी तो करता क्या…. बहन जब हो ही इतनी खूबसूरत……… और उपर से चुदाई की प्यासी भी हो तो……. हाए कैसे सांड़ की तरह चोद रहा था…. जैसे उसकी बहन नही कोई रंडी है… उफ़फ्फ़ साहिबा संभाल खुद को तू फिर से वही सब कुछ…… साहिबा को अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी…….
हाए मेरी माँ में क्या करूँ!… उफ्फ कैसे मसल रहा था मेरे मम्मों को और जब वो मेरे मम्मे चूस रहा था (साहिबा अपने निपल मसलने लगी)…. हाए एसा लग रहा कि जैसे मेरी जान निकल जाएगी…….. और जब वो हमच हमच कर अपनी कमर उछाल उछाल कर अपना लंड मेरी फुद्दि में डाल रहा था और में खुद भी कैसे कमर उछाल उछाल कर….
और में कैसे लफ्ज़ बोल बोल कर उसे उकसा रही थे ताकि वो मुझे, अपनी बहन को और ज़ोर लगा कर चोदे… हाए रब्बा… कितना मज़ा आया था आज़म से अपनी फुद्दि मरवा कर….कितना माल छूटा था उसके लंड से… पूरी फुद्दिईई भर दी थी…… एक बार तो आज़म ने जन्नत की सैर करवा दी.. उफफफफफफफ्फ़.”
साहिबा की आँखों के सामने वो सीन आ गया जब आज़म पागलों की तरह उसे चोद रहा था और साहिबा का हाथ खुद ब खुद नीचे उस की अपनी चूत पर चला गया. साहिबा को एक ज़ोरदार झटका लगा जब साहिबा ने महसूस किया कि उस का हाथ पूरा गीला हो गया है अपनी चूत से निकले रस की वजह से.
साहिबा अपने भाई आज़म के साथ हुई अपनी चुदाई को याद कर फिर से बहुत ज़यादा गरम होने लगी. साहिबा एकदम से आयने के सामने से हट गयी. वो खुद से ही डर गयी थी. साहिबा ने हड़बड़ाहट में बाथरूम का दरवाजा खोल दिया.
साहिबा समझी थी कि कमरे में अंधेरा होगा इसलिए अगर आज़म जाग भी रहा होगा तो वो उसे देख नही पाएगा… मगर साहिबा का अंदाज़ा ग़लत निकला. बाथरूम की लाइट कमरे मे भी जा रही थी और साहिबा देख रही थी. कि आज़म ना सिरफ़ जाग रहा है बल्कि उसका हाथ उपर नीचे हो रहा था.
साहिबा की नज़र घूमती हुई उसके हाथ पर टिक गयी जो उसके लंड के गिर्द कसा हुया था. दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुन कर आज़म ने बाथरूम की तरफ देखा और जब उसने वहाँ अपनी बहन साहिबा को एकदम नंगी खड़ी देखा तो……
साहिबा को भी बाथरूम में खड़े खड़े ख़याल आया कि वो एकदम नंगी है तो उस ने पास लटका हुआ तोलिया उठा कर उसे अपने आगे कर लिया और अपने मम्मे और फुद्दि को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगी.
आज़म की नज़रें अपनी बहन पर टिकी हुई थीं, वो नज़रें फाडे उसे देख रहा था. साहिबा शरम से पानी पानी हो गयी. कुछ सूझ नही रहा था. चाहती तो बाथरूम का दरवाज़ा या फिर लाइट बंद कर लेती मगर वो चाहते हुए भी अपनी जगह से हिल भी ना सकी.
साहिबा ने अपनी नज़रें ऊपर उठाई तो देखा कि आज़म पूरी बेशरमी से आँखें फाडे साहिबा के बदन का मुयायना कर रहा था. उस की आँखे जिन्सी हवस में डूबी होने की वजह से सुर्ख हो रही थीं. और उसका हाथ और भी तेज़ी से उसके लंड पर फिसल रहा था.
दोनो बहन भाई की आँखें आपस में टकराई. पिछली पूरी चुदाई चूँकि अंधेरे में हुई थी. इसलिए दोनो उस वक़्त एक दूसरे को नही देख पाए था. साहिबा ने अपनी नज़रें घुमाई और अपने भाई के लंड को रोशनी में पहली बार गौर से देखा और सिहर गयी.
आज़म ने जब देखा कि उस की बहन उसके लंड को देख रही है तो उसने अपने लंड से हाथ हटा लिया “उफ़फ्फ़ इतना मोटा…. ये मेरी फुद्दि के अंदर था? ….उफ़फ्फ़ …टोपी कितनी मोटी है…. ये मेरी फुद्दि के अंदर घुसा कैसे होगा” साहिबा को यकीन नहीं हो पा रहा था कि इतना मोटा लंड उस की फुद्दी के अंदर घुसा हुआ था.
साहिबा ने फिर से लंड की तरफ देखा. लंड ज़ोर ज़ोर से झटके मार रहा था जैसे बहुत गुस्से में हो. साहिबा ने अपने भाई के लंड से अपनी तवज्जो हटा कर आज़म की आँखों में आँखे डालीं तो उसने अपने भाई की आँखों में अपने लिए हवस का एक तूफान देखा.
लेकिन हवस के साथ साथ साहिबा ने अपनी नशीली जवानी अपने मादक बदन की तारीफ भी अपने भाई की आँखों में देखी. मगर जिस चीज़ ने साहिबा का ध्यान अपनी तरफ खींचा हुआ था आज़म की आँखों में एक इल्तिजा, एक ख्वाहिश, एक चाहत, एक भूख जिस की वजह से आज़म तड़प रहा था.
साहिबा ने एक गहरी साँस ली और अपने हाथों से तौलिया छोड़ दिया. तौलिया छोड़ते ही साहिबा फिर से अपने भाई आज़म के सामने पूरी नंगी हो गयी. अपनी बहन को इस तरह अपने सामने नगा होते देख कर आज़म का चेहरा हज़ार वॉट के बल्व की तरह चमक उठा.
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उस का लंड झटके मारते हुए आज़म के पेट पर चोट मार रहा था लगता था जैसे और मोटा और लंबा होता जा रहा था. आज़म के उस मोटे लंड ने साहिबा को मदहोश कर दिया था. हालाँकि साहिबा जानती थी कि उन दोनो बहन भाई ने बहुत बड़ा गुनाह किया था लेकिन गुनाह का अहसास अब साहिबा के दिल में पहले की निसबत कम हो गया था. साहिबा ये भी जानती थी कि उन्हो ने ग़लती की है लेकिन वो अब अपने भाई आज़म को बिल्कुल कसूरवार नही समझ रही थी. ना ही किसी हद तक खुद को भी.
शायद साहिबा के दिल में इस बात से तस्सली थी कि साहिबा ने आख़िर कार आज अपने बेवफा शोहर से इंतिक़ाम ले लिया है. एक एसा शोहर जो खुद चाहे कितनी ही औरतों से सेक्स करे लेकिन उसे औरत बिल्कुल सती सावित्री चाहिए होती है. साहिबा अपने शोहर के सामने बोल तो नही सकती थी. लेकिन आज उस ने अपने ही भाई से चुदवा कर अपने शोहर से बराबरी कर ली थी. शायद यही वजह थी कि वो इतनी जल्दी अपने गुनाह की तकलीफ़ को भूल चुकी थी. और फिर साहिबा अपने भाई के लंड पर नज़रें जमाए हुए अपने कदम बेड की तरफ बढ़ाने लगी.
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आज़म ने अपना मुँह नीचे झुकाया और अपनी बहन के राइट मम्मे को जीभ से चाटने लगा. भाई का मुँह अपने मम्मे पर लगते ही साहिबा तो जैसे सिहर उठी. उस ने अपने भाई का सिर पकड़ कर अपने मम्मे पर दबाया तो आज़म ने मुँह खोला और अपनी बहन के तने हुए निपल को मुँह लगा कर चूसने लग गया.
अब आगे...
“आज़म… आज़म ए तू की कर दित्ता है.. शीयी” साहिबा फरहत-ए-जज़्बात में पंजाबी ज़ुबान में चिल्ला उठी.
मगर आज़म ने अपनी बहन की बात का कोई जवाब नही दिया और ज़ोर ज़ोर से साहिबा के निपल को काटते हुए उसे चूस्ता रहा, बीच बीच में उसे बदल कर दूसरे मम्मे को चूसने लग जाता. आज़म एक मम्मा चूस्ता तो दूसरा मसलता. साहिबा अपने भाई का वलिहाना प्यार महसूस कर के मज़े के मारे पागल हो रही थी..
पंद्रह मिनिट मम्मे चूस्ते हो गयी थे और साहिबा अब बेसूध होती जा रही थी. तभी साहिबा ने अपने भाई का हाथ अपनी सलवार के नाडे पर महसूस किया. आज़म ने साहिबा का मम्मा मुँह से निकाला और फिर अपनी बहन की शलवार का नाडा पकड़ कर एक ही झटके में खोल दिया.
चुदाई की हवस में डूबी हुई साहिबा ने भी बिना सोचे समझे अपनी कमर उठा कर अपने आप को पूरा नगा करने में अपने ही भाई की मदद की. अगले ही पल साहिबा ने अपने भाई की उंगलियाँ अपनी पैंटी के एलस्टिक में महसूस की और फिर दूसरे झटके में साहिबा की पैंटी भी उस के बदन से अलहदा हो गयी .
अब साहिबा पूरी से नंगी थी. आज से पहले वो ये कभी सोच भी नही सकती थी कि उस का अपना भाई उसे कभी इस तरह ना सिर्फ़ नंगी करे गा बल्कि वो खुद उस के हाथों नंगी होने में उस की मदद करेगी. लेकिन वो सब कुछ जो सोचा नही था हो रहा था और तेज़ी से हो रहा था.
अपनी बहन को मुकम्मल नंगा करने के बाद आज़म ने भी अपनी शलवार उतार कर नीचे फैंक दी. साहिबा बिस्तर पर अपनी टांगे फैलाए पड़ी थी. खुद को नंगा करते ही एक भी लम्हा ज़ाया किए बैगर आज़म फॉरन अपनी बहन साहिबा की खुली टाँगों के बीच आया और अपना लंड अपनी बहन की चूत के मुँह पर टिका दिया.
अपने भाई के मोटे ताज़े और जवान लंड का अपनी गरम प्यासी चूत के साथ टकराव महसूस करते ही साहिबा की चूत जो पहले ही बूरी तरह से गीली थी, वो कांप सी गयी. साहिबा ने बे इकतियार अपनी बाँहे अपने भाई की कमर के गिर्द लपेट दीं.
साहिबा से अब इंतज़ार नही हो रहा था. वो चाहती थी कि अब उस का भाई अपना लंड उस की चूत के अंदर डाल कर उसे बस चोद ही डाले. आज़म अपना लंड अपनी बहन की फुद्दी में डालने की बजाय फुद्दी के होंठो पर के उपर ही अपना लंड रगड़ने लगा.
शायद वो अपनी बहन की फुद्दी की प्यास और बढ़ाने के लिए जान बुझ कर एसा कर रहा था. साहिबा के लिए वाकई ही ये बात अब नकाबिले बर्दास्त होने लगी थी और वो हवस के तूफान में अंधी हो कर अपने भाई पर बरस पड़ी.
“ये क्या कर रहा है. अंदर डाल…अंदर डाल जल्दी से…ही…अब बर्दाश्त नही होता! जल्दी कर!”
आज़म ने जब अपनी बहन के मुँह से ये इल्फ़ाज़ सुने तो एक पल के लिए वो अंधेरे में ही साहिबा का मुँह तकने लगा. शायद उसे यकीन नही हो पा रहा था कि उसकी बहन जिसे वो बचपन से जानता है एसा भी बोल सकती है.
लेकिन साहिबा अपने होशो हवास गँवा चुकी थी. और अब बिस्तर पर आज़म के सामने एक बहन नही बल्कि एक प्यासी औरत पड़ी थी. जिस के बदन की आग आज बहुत उँचाई पर पहुँच चुकी थी. और ये आग अब उस वक़्त सिर्फ़ आज़म के लंड से ही बुझ सकती थी.
“भाईईईईईईई क्या सोच रहे हो.. इसे जल्दी से अंदर डाल… वरना में पागल हो जाऊंगी” साहिबा लगभग चिल्ला उठी थी.
अपनी बहन के चिल्लाने पर आज़म जैसे नींद से जाग उठा. उस ने जल्दी से लंड अपनी बहन की फुद्दि के मुँह पर टिकाया और साहिबा की पतली कमर को अपने हाथों से मज़बूती से थाम लिया. साहिबा ने मदहोशी में अपनी आँखे बंद कर ली, और उस लम्हे के लिए खुद को तैयार कर लिया जिस का उसे अब बेसबरी से इंतज़ार था.
आज़म ने दबाव बढ़ाया और उस का मोटा लंड उस की बहन फुद्दी के लिप्स को फैलाता हुआ फुद्दी के अंदर जाने लगा. पिछले तकरीबन एक साल से साहिबा अपनी शोहर से खूब चुदि थी मगर अपने भाई के मोटे लंड का एहसास ही कुछ और था.
शादी शुदा होने के बावजूद साहिबा की फुद्दि काफ़ी टाइट थी और आज़म के लंड की मोटाई ज़्यादा होने की वजह से आज़म को अपना लंड बहन की चूत में डालते वक़्त खूब ज़ोर लगाना पड़ रहा था. साहिबा को अपने भाई के मोटे लंड को अपनी चूत के अंदर लेते वक़्त हल्की हल्की तकलीफ़ तो हो रही थी.
लेकिन जोश में होने की वजह से उसे अब किसी भी तकलीफ़ की परवाह नही थी. बल्कि उसे तो इस तकलीफ़ में भी एक मज़ा आ रहा था. साहिबा ने अपने भाई के कंधे थाम लिए और अपनी कमर पूरे ज़ोर से उपर उठाते हुए भाई की मदद करने लगी. लंड की टोपी अंदर घुसा कर आज़म रुका फिर उसने साहिबा की कमर पर अपने हाथ कस लिए और एक करारा धक्का मारा.
“हाए…हाए…. आज़म….मार दित्ता तू मेनू…उफ़फ्फ़…बहुत मोटा है तेरा” साहिबा ने फिर मज़े से कराहते हुए कहा.
आज़म के उस एक धक्के में उस का आधा लंड उस की बहन की फुद्दी में पहुँच चुका था. आज़म ने लंड बाहर निकाला और फिर एक ज़ोरदार धक्का मारा. इस बार लंड और अंदर तक चला गया, इसी तरह वो पूरा लंड एकदम से अंदर डाल कर आहिस्ता आहिस्ता अपनी बहन को चोदने लगा.
कुछ ही मिनिट्स में आज़म का लंड साहिबा की फुद्दि की जड़ तक पहुँच चुका था. साहिबा ने अपनी टांगे अपने भाई की कमर के गिर्द लपेट दी. साहिबा के मुख से फूटने वाली हल्की कराहे उस के भाई का हॉंसला बढ़ा रही थीं और वो हर धक्के पर अपनी पूरी ताक़त लगा रहा था. और साहिबा… मज़े की इस हालत में पहुँच चुकी थी. कि इस हालत को लफ़ज़ो में बयान करना उस के लिए ना मुमकिन था.
“आराम से आज़म…. इतना भी ज़ोर मत लगा कि मेरी कमर टूट जाए….. तेरे पास ही हूँ जितना चाहे तू मुझे……”
“क्या करूँ बाजी… उफ्फ तुम्हारी इतनी टाइट है….. कंट्रोल नही…. होता………. एसा मज़ा जिंदगी में पहले कभी नही आया.”
“नही रे तेरा ही इन्ना मोटा है के….. देख तो कैसे फँसा हुया है…. उफ्फ कैसे रगड्र रहा है मेरी फू….”
साहिबा के मुँह से फुद्दि का लफ़्ज निकलते निकलते रह गया. साहिबा ने कभी भी अपने शोहर के साथ सेक्स करते हुए ऐसी ज़ुबान का इस्तेमाल नही किया था. मगर आज अपने भाई के साथ इतनी गर्म जोशी से सेक्स करते वक़्त साहिबा शरम-ओ-हेया की सभी हदें पार कर जाना चाहती थी.
फुद्दि और लंड की जंग जारी थी. फुद्दि में लगा तार पड़ रहे ज़ोरदार धक्कों से ज़ाहिर हो रहा था. कि आज़म को अपनी बहन की फुद्दी चोदने में कितना मज़ा आ रहा था. वो हर धक्के में लंड साहिबा की फुद्दि की जड़ तक डाल देता.
उस का लंड साहिबा की बच्चे दानी पर ठोकर मार रहा था. हर धक्के के साथ उसके टटटे साहिबा फुददी के नीचे ज़ोर से टकराते. साहिबा भी अपने भाई की ताल से ताल मिलाते हुए अपनी कमर उछालती हुई अपनी फुद्दि अपने भाई के लंड पर पटकने लगी.
साहिबा ने आज़म के कंधे मज़बूती से थाम लिए और अपनी टाँगे उसके चुतड़ों के गिर्द कस दी और अपने भाई के हर धक्के का जवाब भी उतने ही जोश से देने लगी जितने जोश से वो अपनी बहन को चोद रहा था. हर धक्के के साथ साहिबा के मुख से सिसकारियाँ फुट रही थी. दोनो बहन भाई के जिस्मों के टकराने और लंड की गीली फुद्दि में हो रही आवाज़ाही से पूरे कमरे में आवाज़ें गूँज़ रही थी.
“और ज़ोर लगा आज़म! और ज़ोर से! हाए एसा मज़ा पहले कभी नही आया! और ज़ोर लगा कर डालो मेरी चूत में भाई.”
साहिबा के मुँह से निकलने वाले अल्फ़ाज़ ने आग में घी का काम किया. आज़म एक बेकाबू सांड़ की तरह अपनी बहन साहिबा को चोदने लगा. सॉफ ज़ाहिर था कि उसे अपनी बहन के मुँह से निकले उन गरम अल्फाज़ो को सुन कर कितना मज़ा आया था. और उसके जोश में कितना इज़ाफ़ा हो गया था. जिस की वजह से उस का हर धक्का उस की बहन की फुद्दि को फाड़ कर रख देने वाला था.
“सबाश भाई…चोद मुझे…और ज़ोर से धक्का मार…. पूरा अंदर तक डाल अपना लंड मेरी फुद्दि में.”
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आज साहिबा ने सब रिश्ते नाते भुला कर दुनियाँ की सब हदें पार कर लीं और इसका इनाम भी उसे खूब मिला. आज़म अपने दाँत पिसते हुए बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से अपनी बहन की फुद्दी चोदने लगा. साहिबा के जिस्म में जैसे करेंट दौड़ रहा था. फुद्दि के अंदर पड़ रही चोटों से मज़े की लहरें उठ कर पूरे बदन में फैल रही थी. जिस वजह से साहिबा अपना जिस्म अकड़ाने लगी. साहिबा अब जल्दी ही छूटने वाली थी.
“हाए! मार दित्ता मेनू!…. उफफफ्फ़ अपनी बहन को….. चोद रहा है या…. पिछले…. किसी जनम का… बदला ले रहा है.”
“नही मेरी बहना! …में तो… तुझे…. दिखा रहा हूँ असली…. चुदाई कैसे… होती है. कैसे एक मर्द……. औरत की तस्सली करता है.”
“हाए…. देखना कहीं….. तस्सल्ली करते करते….. मेरी फुद्दी ना फाड़ देना.”
साहिबा ने अपनी बाहें अपने भाई की गर्दन पर लपेट दीं और अपनी टाँगे भाई की कमर पर और भी ज़ोर से कस दीं. साहिबा की कमर अब हिलनी बंद हो चुकी थी. दोनो भाई बहन बुरी तरह से हांफ रहे थे. साहिबा को अपनी टाइट फुद्दि में अपने भाई का लंड फूलता हुआ महसूस हुआ, लगता था वो भी फारिग होने के करीब ही था.
“आज़म… में छूटने….. वाली हूँ… मेरे साथ साथ तू भी… हाई….हाई… उफफफ्फ़…. भाई…भाईईईईईईई!” और साहिबा की चूत फारिग होने लगी, फुद्दि से गाढ़ा रस निकल कर भाई के लंड को भिगोने लगा. साहिबा की फुद्दि बुरी तरह से खुलते और बंद होते हुए अपने भाई के लंड को कस रही थी.
आज़म ने पूरा लंड बाहर निकाल कर पूरे ज़ोर से अंदर पेला, ऐसे ही दो तीन ज़ोरदार धक्के मारने के बाद एक हुंकार भरते हुए साहिबा के उपर ढह पड़ा. आज़म के लंड से गाढ़ी मलाई निकल कर उस की बहन की चूत को भरने लगी. उन दोनो की हालत बहुत बुरी थी.
साहिबा को एक अंजानी ख़ुसी का अहसास अपने पूरे जिस्म में महसूस हो रहा था. उसे लग रहा था जैसे उस का जिस्म एकदम हल्का हो कर आसमान में उड़ रहा हो. वो पल कितने मजेदार थे, एसा सुख, एसा करार उस ने ज़िंदगी में पहली बार महसूस किया था.
आहिस्ता आहिस्ता साहिबा की फुद्दि ने फड़कना बंद कर दिया. उधर आज़म का लंड भी अब पूर सकून हो चुका था और आहिस्ता आहिस्ता उस का लंड भी सॉफ्ट होता जा रहा था. आज़म अभी तक अपनी बहन के उपर ही गिरा पड़ा था. और उस के जिस्म के बोझ तले साहिबा के लिए अब हिलना भी मुश्किल था.
थोड़ी देर बाद आज़म साहिबा के उपर से उठ कर उस के बराबर में लेट गया. जब दिमाग़ से चूत की गर्मी कम हुई तो तब साहिबा के होशो हवास वापिस लोटने लगे और अब साहिबा का सामना एक होलनाक हक़ीक़त से हो रहा था.
अब उसे ये एहसास हो रहा था कि उन दोनो भाई बहन ने कैसा गुनाह कर दिया है. साहिबा ने जब उन अल्फ़ाज़ को अपने दिल में दोहराया जो उस ने कुछ लम्हे पहले आज़म से सेक्स करते हुए उस को कहे थे तो साहिबा के पूरे बदन में झुरजूरी सी दौड़ गयी.
“में इतनी बेशर्म और बेहया कैसे बन गयी? मेरे मुँह से वो अल्फ़ाज़ कैसे निकल गये? कैसे में भूल गयी कि में अब शादी शुदा हूँ? में क्यों खुद को ये गुनाह करने से रोक नही पाई?”
साहिबा के दिल में अब ये तमाम सवाल उठ रहे थे. जिन का कोई भी जवाब उसे सूझ नही रहा था. सब से बड़ा सवाल तो ये था कि अब में अपने भाई आज़म का सामना कैसे करूँगी!
“वो मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा? कैसे में एक बाज़ारु औरत की तरह उस से पेश आ रही थी! मेरा काम तो अपने भाई को ग़लत रास्ते पर जाने से रोकना था मगर में तो खुद…… खुदा मुझे इस गुनाह के लिए कभी माफ़ नही करेगा” साहिबा दिल ही दिल में खुद को दुतकार रही थी.
उधर बिस्तर पर आज़म की तरफ से भी कोई हलचल नही हो रही थी. शायद उसे भी अपनी बहन साहिबा की सोच का अंदाज़ा हो गया था. जिस वजह से शायद उसको भी अफ़सोस हो रहा था और वो भी अपनी बहन की तरह अपने किए पर अब पछता रहा था.
साहिबा ऐसे ही सोचों में गुम बिस्तर पर पड़ी रही. कोई रास्ता कोई हल उसे नही सूझ रहा था. साहिबा जितना अपने किए हुए गुनाह के बारे में सोच रही थी उतना ही उसे खुद से नफ़रत हो रही थी. ऐसी ही सोचों में गुम काफ़ी वक़्त गुज़र गया.
कमरे में गूँजती आज़म की हल्की हल्की साँसों की आवाज़ से लग रहा था कि वो सो गया है. लेकिन साहिबा की आँखों में तो नींद का नामोनिशान तक ना था. आख़िर कर साहिबा उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गयी. ये सोचते हुए कि शायद नहा कर बदन को कुछ राहत मिले. या नहाने से शायद उस गुनाह की गंदगी उस के बदन से थोड़ी बहुत उतर जाए.
जिस से साहिबा का जिस्म अब भरा पड़ा था. साहिबा इन ही ख़यालों में डूबी हुई बाथरूम में गयी और दरवाज़ा बंद कर के बाथरूम का बल्ब ऑन किर दिया. साहिबा ने जब बाथरूम के आयने में अपनी शकल देखी तो उसे खुद खुद पर ही रहम आने लगा.
साहिबा के पूरे बाल बिखरे हुए थे, होंठ थोड़े सूज गये थे, आँखे एकदम सुर्ख हो गयी थीं और उनमे उदासी सी झलक रही थी. साहिबा ने अपनी एसी हालत पहली बार देखी थी. वो बिना कपड़े पहने ही बाथरूम में चली आई थी.
वैसे भी कमरे में अंधेरा होने की वजह से कपड़े ढूँढने के लिए साहिबा को लाइट जलानी पड़ती. जो वो आज़म के जाग जाने के डर से नही करना चाहती थी. साहिबा की निगाहें आईने में अपने चेहरे से नीचे होते हुए अपने मम्मों पर टिक गयी.
उस के निपल अभी भी अकडे और खड़े हुए थे और वो एक दम सूज गये थे. आज़म के मसल्ने की वजह से साहिबा के मम्मे एकदम सुर्ख हो गये थे. साहिबा ने एक गहरी साँस ली और आयने के सामने से हटते हुए शवर की नीचे चली गयी.
शवर का मुँह खोलते ही साहिबा के बदन पर ठंडा पानी पड़ा तो उस ने फ़ौरन एक राहत की साँस ली. पानी के नीचे खड़े होते ही साहिबा के हाथ उस के जिस्म पर घूमने लगे. जिस्म पर घूमते हुए जैसे ही साहिबा का हाथ उस की फुद्दी पर गया तो उस का पूरा हाथ उस की फुद्दि के अंदर से बह कर बाहर आने वाले उस के अपनी चूत और उस के सगे भाई के लंड के रस से भीग गया.
साहिबा जल्दी जल्दी हाथ चलाते हुए अपनी फुद्दी सॉफ करने लगी. जैसे वो अपने किए हुए गुनाह का सबूत मिटा देना चाहती हो. मगर उस गुनाह की छाप तो साहिबा के तन बदन पर पड़ चुकी थी. अब वो अपने आप को जितना भी सॉफ करती मगर रस था कि निकलता ही जा रहा था.
हार कर साहिबा ने शवर का पाइप निकाला और उसे एक हाथ से पकड़ कर अपनी फुद्दि के मुँह पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी फुद्दि के होंठों को फैलाया जिस से वो अंदर तक सॉफ हो जाए. थोड़ी देर बाद साहिबा ने शवर के पानी से बाथरूम में बने हुए टब को भरा और फिर वो टब में लेट गयी.
साहिबा का दिल अब हर गुज़रते पल के साथ अब कुछ पुरसकून होता जा रहा था. अंदर चल रहा तूफान अब ठंडा पड़ रहा था. साहिबा टब में लेटी लेटी ये सोचने लगी कि कल जब दिन के उजाले में अपने भाई का सामना करूँ गी तो खुद को कैसे संभालूंगी.
एक सवाल जो अब भी साहिबा के दिल में गूँज रहा था. जिससे वो पीछा नही छुड़ा पा रही थी वो ये था कि क्या आज़म भी उस की तरह ही अपने किए पर पछता रहा था. अगर उसके मन दिल में पछतावा नही हुआ और कहीं उसने दुबारा कोशिस की तो……. नही ये दुबारा नही हो सकता. में उसे कभी दुबारा खुद को छूने नही दूँगी.
“हालाकी पिछली बार ग़लती मेरी अपनी थी. इस काम का स्टार्ट जाने अंजाने में खुद मैने किया था. लेकिन वो सब एक ग़लती थी मगर फिर भी अगर आज़म ने सोचा कि मेने खुद जान बुझ कर उससे अपने नाजायज़ ताल्लुक़ात बनाए हैं और में फिर से उससे चुदवाना चाहती हूँ तो? यही सवाल था यो साहिबा को बार बार परेशान किए जा रहा था.
काफ़ी टाइम बाद साहिबा टब से बाहर निकली. अब वो काफ़ी हद तक सम्भल चुकी थी. वो अब पुरसकून थी या फिर ये आने वाले तूफान के पहले की खामोशी थी. साहिबा ने अपना बदन पोंच्छा .अब उस के पहनने के लिए कुछ भी नही था सिवाय बाथरूम में लटके हुए एक टॉवल के. मगर वो छोटा सा तोलिया भी साहिबा के बदन को ढकने के लिए नाकाफ़ी था.
साहिबा फिर से आयने के सामने खड़ी हो गयी और अपने बदन को आयने में दुबारा देखने लगी. साहिबा का दूध सा मखमली बदन बल्ब की रोशनी में दमक रहा था. साहिबा ने अपने बालों में उंगलियाँ फेरते हुए जब उन्हे झटका तो साहिबा के मोटे मोटे माममे उच्छल पड़े .
साहिबा को अपने मम्मों पर अभिमान था. बिल्कुल गोल मटोल उपर हल्के गुलाबी रंग का घेरा और उन पर गहरे गुलाबी रंग के निपल. साहिबा ने अपने दोनो हाथ अपने मम्मों पर रखे और उन्हे आहिस्ता आहिस्ता सहलाया. उफफफ्फ़ कैसे तने हुए जवान मम्मे थे उस के.
“कुछ भी हो एक बात तो है आज़म याद ज़रूर रखेगा इस रात को” चाहे उसकी बहन हूँ लेकिन मेरी जैसी उसे पूरी जिंदगी में दोबारा चोदने को कभी नही मिलेगी……उफ्फ ये में क्या सोच रही हूँ इतना कुछ हो जाने के बाद भी?” साहिबा खुद को दुतकारा.
मगर बात थी तो सच. दूध जैसा गोरा रंग, गोल मटोल मोटे मम्मे, पतली सी कमर और बाहर को निकली गोल गान्ड जिसे देख कर किसी की आँखों में हवस का नशा चढ़ सकता था. “आज़म की तो एक तरह से लॉटरी ही लग गयी थी वरना उसे तो सपने में भी मेरे जैसी चोदने को ना मिले” सोचते हुए साहिबा मुस्करा पड़ी.
इन ही ख़यालो में गुम साहिबा ने जब आहिस्ता आहिस्ता से अपने निप्प्लो को मसला तो उस के मुँह से कराह फुट पड़ी. कैसे मेरा सगा भाई इन्हे ज़ोर ज़ोर से मसल रहा था… और जब उसने इन्हे मुँह में लिया था…. उफ्फ मेरी तो जान ही निकल गयी थी……. लगता था बहुत दिनो से भूखा था और फिर जब इतने दिनो के भूखे को चावलों से भरी थाली मिल जाए तो वो तो टूट ही पड़ेगा…..
बेचारा आख़िर करता भी तो करता क्या…. बहन जब हो ही इतनी खूबसूरत……… और उपर से चुदाई की प्यासी भी हो तो……. हाए कैसे सांड़ की तरह चोद रहा था…. जैसे उसकी बहन नही कोई रंडी है… उफ़फ्फ़ साहिबा संभाल खुद को तू फिर से वही सब कुछ…… साहिबा को अपने अंदर से एक आवाज़ सुनाई दी…….
हाए मेरी माँ में क्या करूँ!… उफ्फ कैसे मसल रहा था मेरे मम्मों को और जब वो मेरे मम्मे चूस रहा था (साहिबा अपने निपल मसलने लगी)…. हाए एसा लग रहा कि जैसे मेरी जान निकल जाएगी…….. और जब वो हमच हमच कर अपनी कमर उछाल उछाल कर अपना लंड मेरी फुद्दि में डाल रहा था और में खुद भी कैसे कमर उछाल उछाल कर….
और में कैसे लफ्ज़ बोल बोल कर उसे उकसा रही थे ताकि वो मुझे, अपनी बहन को और ज़ोर लगा कर चोदे… हाए रब्बा… कितना मज़ा आया था आज़म से अपनी फुद्दि मरवा कर….कितना माल छूटा था उसके लंड से… पूरी फुद्दिईई भर दी थी…… एक बार तो आज़म ने जन्नत की सैर करवा दी.. उफफफफफफफ्फ़.”
साहिबा की आँखों के सामने वो सीन आ गया जब आज़म पागलों की तरह उसे चोद रहा था और साहिबा का हाथ खुद ब खुद नीचे उस की अपनी चूत पर चला गया. साहिबा को एक ज़ोरदार झटका लगा जब साहिबा ने महसूस किया कि उस का हाथ पूरा गीला हो गया है अपनी चूत से निकले रस की वजह से.
साहिबा अपने भाई आज़म के साथ हुई अपनी चुदाई को याद कर फिर से बहुत ज़यादा गरम होने लगी. साहिबा एकदम से आयने के सामने से हट गयी. वो खुद से ही डर गयी थी. साहिबा ने हड़बड़ाहट में बाथरूम का दरवाजा खोल दिया.
साहिबा समझी थी कि कमरे में अंधेरा होगा इसलिए अगर आज़म जाग भी रहा होगा तो वो उसे देख नही पाएगा… मगर साहिबा का अंदाज़ा ग़लत निकला. बाथरूम की लाइट कमरे मे भी जा रही थी और साहिबा देख रही थी. कि आज़म ना सिरफ़ जाग रहा है बल्कि उसका हाथ उपर नीचे हो रहा था.
साहिबा की नज़र घूमती हुई उसके हाथ पर टिक गयी जो उसके लंड के गिर्द कसा हुया था. दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुन कर आज़म ने बाथरूम की तरफ देखा और जब उसने वहाँ अपनी बहन साहिबा को एकदम नंगी खड़ी देखा तो……
साहिबा को भी बाथरूम में खड़े खड़े ख़याल आया कि वो एकदम नंगी है तो उस ने पास लटका हुआ तोलिया उठा कर उसे अपने आगे कर लिया और अपने मम्मे और फुद्दि को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगी.
आज़म की नज़रें अपनी बहन पर टिकी हुई थीं, वो नज़रें फाडे उसे देख रहा था. साहिबा शरम से पानी पानी हो गयी. कुछ सूझ नही रहा था. चाहती तो बाथरूम का दरवाज़ा या फिर लाइट बंद कर लेती मगर वो चाहते हुए भी अपनी जगह से हिल भी ना सकी.
साहिबा ने अपनी नज़रें ऊपर उठाई तो देखा कि आज़म पूरी बेशरमी से आँखें फाडे साहिबा के बदन का मुयायना कर रहा था. उस की आँखे जिन्सी हवस में डूबी होने की वजह से सुर्ख हो रही थीं. और उसका हाथ और भी तेज़ी से उसके लंड पर फिसल रहा था.
दोनो बहन भाई की आँखें आपस में टकराई. पिछली पूरी चुदाई चूँकि अंधेरे में हुई थी. इसलिए दोनो उस वक़्त एक दूसरे को नही देख पाए था. साहिबा ने अपनी नज़रें घुमाई और अपने भाई के लंड को रोशनी में पहली बार गौर से देखा और सिहर गयी.
आज़म ने जब देखा कि उस की बहन उसके लंड को देख रही है तो उसने अपने लंड से हाथ हटा लिया “उफ़फ्फ़ इतना मोटा…. ये मेरी फुद्दि के अंदर था? ….उफ़फ्फ़ …टोपी कितनी मोटी है…. ये मेरी फुद्दि के अंदर घुसा कैसे होगा” साहिबा को यकीन नहीं हो पा रहा था कि इतना मोटा लंड उस की फुद्दी के अंदर घुसा हुआ था.
साहिबा ने फिर से लंड की तरफ देखा. लंड ज़ोर ज़ोर से झटके मार रहा था जैसे बहुत गुस्से में हो. साहिबा ने अपने भाई के लंड से अपनी तवज्जो हटा कर आज़म की आँखों में आँखे डालीं तो उसने अपने भाई की आँखों में अपने लिए हवस का एक तूफान देखा.
लेकिन हवस के साथ साथ साहिबा ने अपनी नशीली जवानी अपने मादक बदन की तारीफ भी अपने भाई की आँखों में देखी. मगर जिस चीज़ ने साहिबा का ध्यान अपनी तरफ खींचा हुआ था आज़म की आँखों में एक इल्तिजा, एक ख्वाहिश, एक चाहत, एक भूख जिस की वजह से आज़म तड़प रहा था.
साहिबा ने एक गहरी साँस ली और अपने हाथों से तौलिया छोड़ दिया. तौलिया छोड़ते ही साहिबा फिर से अपने भाई आज़म के सामने पूरी नंगी हो गयी. अपनी बहन को इस तरह अपने सामने नगा होते देख कर आज़म का चेहरा हज़ार वॉट के बल्व की तरह चमक उठा.
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उस का लंड झटके मारते हुए आज़म के पेट पर चोट मार रहा था लगता था जैसे और मोटा और लंबा होता जा रहा था. आज़म के उस मोटे लंड ने साहिबा को मदहोश कर दिया था. हालाँकि साहिबा जानती थी कि उन दोनो बहन भाई ने बहुत बड़ा गुनाह किया था लेकिन गुनाह का अहसास अब साहिबा के दिल में पहले की निसबत कम हो गया था. साहिबा ये भी जानती थी कि उन्हो ने ग़लती की है लेकिन वो अब अपने भाई आज़म को बिल्कुल कसूरवार नही समझ रही थी. ना ही किसी हद तक खुद को भी.
शायद साहिबा के दिल में इस बात से तस्सली थी कि साहिबा ने आख़िर कार आज अपने बेवफा शोहर से इंतिक़ाम ले लिया है. एक एसा शोहर जो खुद चाहे कितनी ही औरतों से सेक्स करे लेकिन उसे औरत बिल्कुल सती सावित्री चाहिए होती है. साहिबा अपने शोहर के सामने बोल तो नही सकती थी. लेकिन आज उस ने अपने ही भाई से चुदवा कर अपने शोहर से बराबरी कर ली थी. शायद यही वजह थी कि वो इतनी जल्दी अपने गुनाह की तकलीफ़ को भूल चुकी थी. और फिर साहिबा अपने भाई के लंड पर नज़रें जमाए हुए अपने कदम बेड की तरफ बढ़ाने लगी.
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